Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
प्राज्ञश्चेतनमात्रस्त्वं न देहस्त्वं जडात्मकः ।
अन्येन चेतसा तत्ते चेत्यत्वं क्वेव विद्यते ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
“यो मनसि तिष्ठन्मनोऽन्तरो यं मनो न वेद” इस श्रुति से मन को प्रेरित करनेवाला
प्रज्ञानामक आत्मा दूसरा युना जाता है उसके अधीन ही मनोवासनाएँ होती हैं, ऐसी परिस्थिति
में सद्बासनाओं के उत्पादन में मेरी स्वतन्त्रता कहाँ है ? ऐसी शंका उठने पर कहते हैं।
जो चेतनमात्र प्राज्ञ श्रुति में कहा गया है, वही आप हैं। आप जड़रूप सूक्ष्म, स्थूल देह नहीं
हैं जिससे उससे अपने को पृथक् समझें, इसलिए चेतनरूप आपकी अन्य चेतन से भास्यता
कहाँ है ? भाव यह कि यदि प्राज्ञ आप से पृथक् हो, तो चेतन का अन्य चेतन से प्रकाश न होने
के कारण आपको प्रकाशित न करता हुआ वह सर्वज्ञ न होगा, इसलिए आप ही प्राज्ञ हो, इस
प्रकार प्राज्ञ और आपमें अभेद सिद्ध हुआ