Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ यत्प्राक्कर्मोपसंचितम् ।
तद्दैव दैवमित्युक्तमपमृष्ट कथं त्वया ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
दोनो कल्पो के अभेद का कथन करने से आशय को न जान रहे एवं प्रथम कल्प का
उपक्रमकर द्वितीय कल्य से उपसंहार करने मे विरोध को जान रहे श्रीरामचन्द्रजी अपने अभिप्राय
को प्रकट करते हुए बोले ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, जो प्राक्तन कर्म है वही दैव है, ऐसा आपने
बार-बार कहा, फिर दैव है ही नहीं, इस प्रकार उसका आप अपलाप कैसे करते हैं यानी उसके
अपलाप करने में आपका क्या अभिप्राय है ?