Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 12–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verses 12–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 12-16
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
साधु राघव जानासि शृणु वक्ष्यामि तेऽखिलम् ।
दैवं नास्तीति ते येन स्थिरा बुद्धिर्भविष्यति ॥ १२ ॥
या मनोवासना पूर्व बभूव किल भूरिशः ।
सैवेयं कर्मभावेन नृणां परिणतिं गता ॥ १३ ॥
जन्तुर्यद्वासनो राम तत्कर्ता भवति क्षणात् ।
अन्यकर्मान्यभावश्चेत्येतन्नैवोपपद्यते ॥ १४ ॥
ग्रामगो ग्राममाप्नोति पत्तनार्थी च पत्तनम् ।
यो यो यद्वासनस्तत्र स स प्रयतते सदा ॥ १५ ॥
यदेव तीव्रसंवेगाद्दृढं कर्म कृतं पुरा ।
तदेव दैवशब्देन पर्यायेणेह कथ्यते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्र, ठीक
है, आप उन दोनों कल्पो के विरोध को जानते हैँ, सुनिए, मैं आपसे सम्पूर्ण वृत्तान्त को
कहूँगा, जिससे देव हे ही नहीं, यह आपकी बुद्धि स्थिर हो जायेगी । मनुष्यों के मन में पहले जो
अनेक प्रकार की वासनाएँ हुई थीं, वे ही कायिक ओर वाचिक कर्मरूप से परिणत हुई क्योकि
"यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति" यानी जिसका मन से चिन्तन करता है
उसको वाणी से बोलता है और उसको कर्म से करता हे । हे रामजी, प्राणी में जिस प्रकार की
वासना होती है, वह शीघ्र ही वैसा कर्म करता हे । अन्य प्रकार की वासना हो और अन्य कर्म
करे यह बात नहीं बन सकती । गाँव में जाने की जिसकी इच्छा होती है वह गाँव में पहुँचता है
और शहर में जाने की जिसकी इच्छा होती वह शहर में पहुँचता है, जिसकी जिस विषय में
अभिलाषा होती है वह उस विषय में प्रयत्न करता है । पूर्वजन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से
जो कर्म प्रबल प्रयत्न से किया जाता है वही इस जन्म में दैव शब्द से कहा जाता है अर्थात्
पूर्वजन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से किये गये कर्म का ही दूसरा नाम दैव है, अतः दैव कर्म
से अतिरिक्त नहीं हे