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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 34–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verses 34–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

वासनौघस्त्वया पूर्वमभ्यासेन घनीकृतः । शुभो वाप्यशुभो वापि शुभमद्य घनीकुरु ॥ ३४ ॥ प्रागभ्यासवशाद्याता यदा ते वासनोदयम् । तदाभ्यासस्य साफल्यं विद्धि त्वमरिमर्दन ॥ ३५ ॥ इदानीमपि ते याति घनतां वासनानघ । अभ्यासवशतस्तस्माच्छुभाभ्यासमुपाहर ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

शीघ्र हठपूर्वक उसका निरोध न करें, ऐसा करने से उद्वेग से समाधि के टूटने का भय रहता है। भगवान्‌ ने भी श्रीमुख से कहा है : शनै: शनैरुपरभेद्‌ बुद्धया धृतिग्रहीतया । (धारणा से वश में की गई बुद्धि से मन को शनैः शनैः (अभ्यासक्रम के अनुसार न कि सहसा) बाह्य विषयों से विरत करे।) आपने पहले अभ्यास से चाहे शुभ वासनाओं को चाहे अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा हो, किन्तु इस समय तो आप शुभ वासनाओं को ही दृढ़ कीजिए । भाव यह कि पूर्वजन्मों में यदि आपके अभ्यास से शुभ वासनाओं को ही दृढ किया होगा, तो इस समय भी शुभ वासनाओं को ही दृढ करने से शीघ्र फल प्राप्त होगा । यदि पूर्वजन्म मेँ अशुभ वासनाओं को निविड बना रक्खा होगा, तो विरोधी वासनाओं के विनाश के लिए भी शुभ वासनाओं के दुढीकरण की आवश्यकता है