Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
मनश्चित्तं वासना च कर्म दैवं च निश्चयः ।
राम दुर्निश्चयस्यैताः संज्ञाः सद्भिरुदाहृताः ॥ २० ॥
एवंनामा हि पुरुषो दृढभावनया यथा ।
नित्यं प्रयतते राम फलमाप्नोत्यलं तथा ॥ २१ ॥
एवं पुरुषकारेण सर्वमेव रधूद्वह ।
प्राप्यते नेतरेणेह तस्मात्स शुभदोऽस्तु ते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मन अत्यन्त असत् है, तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? अत्यन्त असरत्
वन्ध्यायुत्र आदि से किसी व्यवहार की सिद्धि नहीं देखी जाती, ऐसी आशंका कर युक्ति से
उसकी अनिर्ववनीयता को दर्शा रहे “तदेतद्धृहयं मनश्वैतात्संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानम्“
(वही हृदय, मन, संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान है) इत्यादि श्रुति के अनुसार मन की ही
दैव आदि संज्ञाएँ हैं। ऐसा कहते है ।
हे श्रीरामजी, मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव ओर निश्चय ये सब सत्त्व था असत्त्व, चित्त्व या
जडत्व, भेद या अभेद आदि से तत्वतः जिसका निश्चय नहीं हो सकता ऐसे मिथ्याभूत मन की
(मनोरूपता को प्राप्त हुए पुरुष की) संज्ञाएँ कही गई हैँ । यों पुरुष की स्वतन्त्रता सिद्ध हुई, ऐसा
कहते हैं । हे रामचन्द्र, पूर्वोक्त नामोंवाला (मन, चित्त आदि संज्ञाओंवाला) पुरुष दृढ़ वासना
से जैसा नित्य प्रयत्न करता है वैसा ही उसे पर्याप्त फल मिलता हे । हे रघुकुलतिलक, इस प्रकार
पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए
आपका पुरुषप्रयत्न शुभ फल देनेवाला हो