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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, Verses 41–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 9, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 41,42

संस्कृत श्लोक

अव्युत्पन्नमना यावद्भवानज्ञाततत्पदः । गुरुशास्त्रप्रमाणैस्तु निर्णीतं तावदाचर ॥ ४१ ॥ ततः पक्वकषायेण नूनं विज्ञातवस्तुना । शुभोप्यसौत्वया त्याज्यो वासनौघो निराधिना ॥ ४२ ॥ यदतिसुभगमार्यसेवितं च्छुभमनुसृत्य मनोज्ञभावबुद्ध्या । अधिगमय पदं सदा विशोक तदनु तदप्यवमुच्य साधु तिष्ठ ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

कितने समय तक शुभ वासना का अभ्यास करना चाहिए ? भद्र जब तक गुरु के उपदेश, शास्त्राभ्यास और युक्ति, अनुभव आदि प्रमाणों से तत्पद का निर्णय न हो जाय और जब तक अव्युत्पन्न चित्तवाले आपको तत्पद का ज्ञान न हो जाय, तबतक शुभवासनाओं का आचरण कीजिए | तदुपरान्त जव जैसे क्षार में पकाने से वस्त्र आदि में लगे हुए मल आदि शिथिल हो जाते हैं वैसे ही आपके राग आदि दोष नष्ट हो जाय, परमतत्त्व का परिज्ञान हो जाय और मानसिक व्यथाएँ नष्ट हो जाय तब आपको निश्चय इस शुभ वासनासमूह का भी परित्याग कर देना चाहिए