Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 20
उन्नीसवाँ सर्ग समाप्त बीसवाँ सर्ग लोभ, द्वेष, मद, ईर्ष्या, अभिमान और डाह से दूषित एवं काम आदि अनर्थो के घर यौवन की निन्दा ।
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- Verses 1–2बाल्यावस्था अतिमूर्खता, असामर्थ्य ओर परतन्त्रता आदि से दुःखपूर्ण भले ही हो, पर यौवन अवस्थ…
- Verse 3माण्डव्य ऋषि ने व्यवस्था कर रक्खी है कि चौदह वर्ष तक किये गये दुष्कर्म से नरकप्राप्ति नही…
- Verse 4जैसे निधि आदि को देखने के लिए बालकों के हाथ में रक्खा हुआ सिद्धांजन चंचल वृत्तिवाली नेत्र…
- Verses 5–7मुनिवर, यौवनावस्था में स्त्री, जुआ, कलह आदि व्यसनों को उत्पन्न करनेवाले राग, लोभ आदि दोष-…
- Verses 8–9क्षणभर के लिए दैदीप्यमान, चंचल मेघां के गर्जन से युक्त बिजली के समान प्रकाशमान अमंगलमय यौ…
- Verse 10यौवन है तो निरा असत्य पर सत्य-सा प्रतीत होता हे, शीघ्र ही लोगों को अपनी वचना का शिकार बना…
- Verse 11यौवन एक क्षणभर के लिए सुन्दर प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण वस्तुओं में, गन्धर्वनगर (=) के सदुश…
- Verse 12प्रत्यंचा से छोड़ा गया बाण जितने समय में लक्ष्य का वेध करता हे, केवल उतने समय तक सुखदायक,…
- Verse 13यौवन केवल आपाततः जब तक विचार न किया जाय तभी तक रमणीय प्रतीत होता है, इसमें शुद्धचित्तता क…
- Verse 14जैसे प्रलयकाल में सबको दुःख देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात चारों ओर से उमड़ पडते हैं वैसे ही य…
- Verse 15हृदय में अन्धकार करनेवाली यौवनयुक्त अज्ञान-रात्रि से विशाल आकारवाले भगवान् महादेवजी भी न…
- Verse 16यह यौवनकालीन मोह शुभ आचरण को भुलानेवाली एवं बुद्धि को कुण्ठित करनेवाली (बुद्धिनाश करनेवाल…
- Verse 17जैसे वनाग्नि से वृक्ष जलाया जाता है, वैसे ही युवावस्था में प्रियतमा के वियोग से उत्पन्न द…
- Verse 18बुद्धि दोषों के निराकरण से कितनी ही निर्मल क्यों न हो, कितनी ही उदार क्यों न हो और गुणों…
- Verse 19बड़ी-बड़ी लहरों से युक्त भीषण नदी लाँघी जा सकती है, पर भोगतृष्णा से चंचल इन्द्रियोंवाली य…
- Verse 20वह मनोहारिणी कान्ता, उसके वे विशाल स्तन, वे मनोज्ञ हावभाव और वह सुन्दर मुख युवावस्थामें ऐ…
- Verse 21इस संसार में सज्जन लोग चंचल भोगतृष्णा से प्रपीडित युवा पुरुष का आदर-सत्कार नहीं करते, केव…
- Verses 22–23मनस्वियों के लिए मानहानि मरण के समान क्लेशकारक है, इस अभिप्राय से कहते हैं। यौवन अभिमान स…
- Verse 24मुनिवर, आप यौवन को दुष्ट चिन्तारूपी भ्रमरों का आवासभूत कमल समझिए। वह विषयसुखकणरूपी मधु-बि…
- Verses 25–28यौवन पुण्य और पाप रूपी या लौकिक कार्यरूपी, पतन के हेतु होने से, कुत्सित पंखवाले, हृदयरूपी…
- Verse 29मनुष्यों का योवनोल्लास (यौवन की अभिवृद्धि) दोषों को जगाता है, उत्पन्न करता है ओर गुणों का…
- Verse 30मुनिवर, मनुष्यों का नवयौवन चन्द्रमा के सदृश है । जैसे चन्द्रमा कमल के पराग मेँ आसक्त भँवर…
- Verse 31शरीररूपी छोटे बन में उत्पन्न हुई बड़ी रमणीय यौवनरूपी मंजरी जब उत्कर्षं को प्राप्त होती है…
- Verse 32मुनिवर, शरीररूपी मरुभूमि में कामरूपी सूर्य के ताप से प्रतीत हो रही यौवनरूपी मृगतृष्णिका क…
- Verse 33शरीररूपी रात्रि की चाँदनी, मनरूपी सिंह की अयाल (गर्दन के बाल) ओर जीवनरूपी समुद्र की लहरी…
- Verse 34जो यह युवावस्था है, यह देहरूपी जंगल में कुछ दिनों के लिए फली- फूली शरद्तऋतु है, यह शीघ्र…
- Verse 35जैसे अभागे पुरुष के हाथ से चिन्तामणि (अभीष्ट पदार्थ देनेवाला रत्न) तत्काल चला जाता हे, वै…
- Verse 36जब यौवन अपनी चरम सीमा में आरूढ हो जाता है, तब केवल नाश के लिए ही सन्तापयुक्त कामनाएँ वृद्…
- Verses 37–40तभी तक राग-द्रेषरूपी पिशाच विशेषरूप से इधर-उधर घूमते-फिरते हैँ, जब तक यह योवनरूपी रात्रि…
- Verses 41–42जैसे विविध बालक्रीड़ाएँ करनेवाले, क्षणभर में नष्ट होनेवाले मरणासन्न पुत्र में लोगों की कर…
- Verse 43बाल्यावस्था ओर वृद्धावस्था में अज्ञान ओर अशक्ति से पुरुषार्थ साधन नहीं हो सकता ओर युवावस्…