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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 25–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verses 25–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 25-28

संस्कृत श्लोक

कृताकृतकुपक्षाणां हृत्सरस्तीरचारिणाम् । आधिव्याधिविहंगानामालयो नवयौवनम् ॥ २५ ॥ जडानां गतसंख्यानां कल्लोलानां विलासिनाम् । अनपेक्षितमर्यादो वारिधिर्नवयौवनम् ॥ २६ ॥ सर्वेषां गुणसर्गाणां परिरूढरजस्तमाः । अपनेतुं स्थितिं दक्षो विषमो यौवनानिलः ॥ २७ ॥ नयन्ति पाण्डुतां वक्रमाकुलावकरोत्कटाः । आरोहन्ति परां कोटिं रूक्षा यौवनपांसवः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यौवन पुण्य और पाप रूपी या लौकिक कार्यरूपी, पतन के हेतु होने से, कुत्सित पंखवाले, हृदयरूपी तालाब के तीरपर विचरनेवाले आधि-व्याधिरूपी पक्षियों का निवासस्थान हे । नवयोवन असंख्य एवं वृद्धि को प्रात होनेवाली तुच्छ संकल्प-विकल्परूप लहरों का अवधिरहित (असीम) या अन्त में जरा आदि दुःख देनेवाला सागर हैं । अर्थात्‌ जैसे असीम समुद्र असंख्य और क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होनेवाली जलमय तरगों का एकमात्र आश्रय है, वैसे ही अन्त में जरा, मरण आदि दुःख का स्थान नवयौवन भी असंख्य ओर लगातार बढनेवाली संकल्प-विकल्प-परम्परा का एकमात्र आश्रय हे । जैसी संकल्प-विकल्प-परम्परार्ँ यौवनकाल में होती हैं, वैसी अन्यकाल में नहीं होती, यह आशय हे । यौवन आँधी के समान है । जैसे धूलि से अन्धकारपूर्ण आँधी मकड़ी के सम्पूर्ण जालों को तहस-नहस करने में सिद्धहस्त होती है, वैसे ही रजोगुण ओर तमोगुण से पूर्ण विषम यौवन सत्संगति, शास्त्राभ्यास आदि अनेक प्रयत्नों से उत्पन्न होनेवाले सद्‌गुणों की (प्रसाद, प्रकाश, विवेकदृष्टि की अभिवृद्धि आदि की) स्थिरता को नष्ट करने में बड़ा दक्ष है। यौवन अतिरूक्ष पांसुओं के (आँधी में उड़नेवाले धूलिकणों के) समान है। जैसे इधर-उधर उड़ रहे अपवित्र तृण-पत्तों से अधिक दुःखदायक अतिरूक्ष धूलिकण लोगों के मुँह को धूलि-धूसर कर देते हैं और आकाश में बहुत ऊँचे स्थान में चढ़ते है, वैसे ही विषयोन्मुख चंचल इन्द्रियों द्वारा अधिक कष्टदायक रूक्ष यौवन भी विषयवासना से उत्पन्न रोगों से लोगों के मुँह को घूसर (रक्तताशून्य सफेद) कर देता है ओर दोषों की परम सीमा में आरूढ होता है