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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । बाल्यानर्थमथ त्यक्त्वा पुमानभिहताशयः । आरोहति निपाताय यौवनं संभ्रमेण तु ॥ १ ॥ तत्रानन्तविलासस्य लोलस्य स्वस्य चेतसः । वृत्तीरनुभवन्याति दुःखाद्दुःखान्तरं जडः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

बाल्यावस्था अतिमूर्खता, असामर्थ्य ओर परतन्त्रता आदि से दुःखपूर्ण भले ही हो, पर यौवन अवस्था मेये बातें नहीं है, उसमें नानाभोग भोगने से उत्पन्न आनन्द ही आनन्द रहता है, इसलिए वह सुख की कारण है, ऐसी शंका करके यौवन की अत्यंत अनर्थकारिता का वर्णन करने के लिए कहते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, बाल्यावस्था के अनन्तर पुरुष बाल्यावस्था के अनर्थो को त्यागकर भोग भोगने के उत्साह से या आनेवाले कामरूप पिशाच से दूषितचित्त होकर नरकपात के लिए ही यौवनारूढ होता है । मूर्ख पुरुष योवनावस्था में अनन्त चेष्टावाले अतएव चंचल अपने चित्त की राग, द्वेष आदि वृत्तियों का अनुभव करता हुआ एक दुःख से दूसरे दुःख को प्राप्त होता है अर्थात्‌ दुःख परम्परा का भोग करता हे

सर्ग सन्दर्भ

उन्‍नीसवाँ सर्ग समाप्त बीसवाँ सर्ग लोभ, द्वेष, मद, ईर्ष्या, अभिमान और डाह से दूषित एवं काम आदि अनर्थो के घर यौवन की निन्दा ।