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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 41–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 41-42

संस्कृत श्लोक

ते पूज्यास्ते महात्मानस्त एव पुरुषा भुवि । ये सुखेन समुत्तीर्णाः साधो यौवनसंकटात् ॥ ४१ ॥ सुखेन तीर्यतेऽम्भोधिरुत्कृष्टमकराकरः । न कल्लोलबलोल्लासि सदोषं हतयौवनम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे विविध बालक्रीड़ाएँ करनेवाले, क्षणभर में नष्ट होनेवाले मरणासन्न पुत्र में लोगों की करुणा होती हे, वैसे ही विविध चित्तविकारो (मनोरथो ) से बढ़ी-चढ़ी, थोडे समयतक रहकर नष्ट हो जानेवाली वेचारी युवावस्थापर भी करुणा करो । जो मनुष्य क्षणभर में विनष्ट होनेवाले यौवन से मूढतावश फूला नहीं समाता, वह मनुष्य होता हुआ भी निरा पशु ही है, क्योकि वह महामूढ हे । जो मनुष्य अभिमान युक्त अज्ञान के कारण मदोन्मत्त युवावस्था को उपादेय (सारयुक्त) वस्तु समझकर उस पर आसक्त होता हे उस दुर्बुद्धि को शीघ्र ही पश्चात्ताप भोगना पडता है ॥ ३ ८-४०॥ मुनिवर, इस जगत में वे लोग पूजनीय हैं, वे ही महात्मा हैं और वे ही पुरुष हैं, जिन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि की हानि के बिना सुखपूर्वक यौवनरूपी संकट को पार कर दिया। बड़े-बड़े मगरो से पूर्ण सागर सुखपूर्वक तैरा जा सकता हे, परन्तु रागद्वेष आदि रूप महातरंगोँ के कारण उमड़ा हुआ ओर अनेक दोषों से युक्त निन्दनीय यौवन के पार जाना कठिन हे