Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चिन्तानां लोलवृत्तीनां ललनानामिवाऽवृतीः ।
अर्पयत्यवशं चेतो बालानामञ्जनं यथा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे निधि आदि को देखने
के लिए बालकों के हाथ में रक्खा हुआ सिद्धांजन चंचल वृत्तिवाली नेत्रप्रभाओं के अनावरण को -भूमि,
शिला आदि के व्यवधान को हटाकर निधि देखने की सामर्थ्य देता है, वैसे ही यौवनावस्था में अवश चित्त
युवतियों के चित्त से भी चंचल नाना प्रकार की चिन्ताओं के कपाट खोल देता है अर्थात् यौवनावस्था में
पुरुष को विविध चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है