Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
शरीरपङ्कजरजश्चञ्चलां मतिषट्पदीम् ।
निबध्नन्मोहयत्येष नवयौवनचन्द्रमाः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर, मनुष्यों का नवयौवन चन्द्रमा के सदृश है । जैसे चन्द्रमा कमल के पराग मेँ आसक्त
भँवरी को कमल में बोधकर मोहित कर देता हे, वैसे ही नवयौवन शरीर में ही चंचल बुद्धि को अभिमानरूप
कोश में बाँध कर विमूढ कर देता है