Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
नाशायैव मदार्तस्य दोषमौक्तिकधारिणः ।
अभिमानमहेभस्य नित्यालानं हि यौवनम् ॥ २२ ॥
मनोविपुलमूलानां दोषाशीविषधारिणाम् ।
शोषरोदनवृक्षाणां यौवनं बत काननम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
मनस्वियों के लिए मानहानि मरण के समान क्लेशकारक है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
यौवन अभिमान से महागज के समान जड़ और दोषरूप मोतियों को धारण करनेवाले अविवेकी
पुरुष के अधःपतन के लिए नित्य बन्धन का स्तम्भ है या जैसे आलान (हाथी को बाँधने का खूँटा)
मोतीवाले मदोन्मत्त गजराज के दर्पं को चूर्ण कर देता है, वैसे ही यौवन भी अभिमान से मत्त ओर विविध
दोषों से पूर्ण पुरुष का अधःपतन कर देता है । मुनिवर, खेद है कि मनुष्यों का यौवन वनस्वरूप है,
प्रियतम स्त्री, पुत्र आदि इष्ट पदार्थों की अप्राप्ति और वियोग-जनित सन्ताप से पैदा हुआ शोष और
रोदन उसके वृक्ष हैं, मन उक्त वृक्षों की बड़ी जड़ है और दोषरूपी साँप उन वृक्षों के खोखलों में निवास
करते हैं