Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सुनिर्मलापि विस्तीर्णा पावन्यपि हि यौवने ।
मतिः कलुषतामेति प्रावृषीव तरङ्गिणी ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धि
दोषों के निराकरण से कितनी ही निर्मल क्यों न हो, कितनी ही उदार क्यों न हो और गुणों के आधान से
कितनी ही पवित्र क्यों न हो, पर जैसे वर्षा ऋतु में नदियाँ मलिन हो जाती हैं, वैसे ही यौवन में मलिन हो
जाती है अर्थात् जैसे निर्मल पवित्र, शीतल और मधुर जलवाली नदी वर्षा ऋतु में मलिन हो जाती है, वैसे
ही निर्मल, उदार और पवित्र बुद्धि भी युवावस्था में मलिन हो जाती है