Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ये केचन समारम्भास्ते सर्वे सर्वदुःखदाः ।
तारुण्ये संनिधिं यान्ति महोत्पाता इव क्षये ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे प्रलयकाल में सबको दुःख देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात चारों ओर से
उमड़ पडते हैं वैसे ही युवावस्था में भी, सबको दुःख देनेवाले जो कोई कार्य हैं, वे सब समीप में आ जाते
हैं अर्थात् युवावस्था में परदुःखदायी अनेक दुष्कर्म होते हैं