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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

नरं तरलतृष्णार्ति युवानमिह साधवः । पूजयन्ति न तु च्छिन्नं जरत्तृणलवं यथा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस संसार में सज्जन लोग चंचल भोगतृष्णा से प्रपीडित युवा पुरुष का आदर-सत्कार नहीं करते, केवल यही बात नहीं है, किन्तु वे कटे हुए और सूखे तिनके के समान उसका तिरस्कार करते हैं