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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

निमेषभासुराकारमालोलघनगर्जितम् । विद्युत्प्रकाशमशिवं यौवनं मे न रोचते ॥ ८ ॥ मधुरं स्वादु तिक्तं च दूषणं दोषभूषणम् । सुराकल्लोलसदृशं यौवनं मे न रोचते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

क्षणभर के लिए दैदीप्यमान, चंचल मेघां के गर्जन से युक्त बिजली के समान प्रकाशमान अमंगलमय यौवन मुझे पसन्द नहीं है। अर्थात्‌ जैसे वर्षा ऋतु की रात्रि क्षण भर के लिए बिजली के प्रकाश से देदीप्यमान हो उठती है और चंचल मेघों के गर्जन-तर्जन से गूँज उठती है, वैसे ही योवनावस्था भी स्वल्पकाल के लिए उज्जवल है घोर गर्जना ओं के समान अभिमानपूर्ण उक्तियों से युक्त अमंगलमय यह यौवन मुझे भला नहीं लगता । मुनिवर, भोग के समय मीठा अतएव बड़ा भला लगनेवाला, अन्त में दुःखदायी होने के कारण नीम के समान कड़वा, दोषरूप, निन्दा के हेतुभूत सम्पूर्ण दोषों का भूषण (सब दोषों में श्रेष्ठ), शराब के नशे के सदुश यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता