Guru's AddaGuru's Adda

Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 12

ग्यारहर्वौँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग भोगों की दुःखरूपता, विषय आदि की असत्यता तथा सम्पत्ति की अनर्थहेतुता का वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1वाल्मीकीजी ने कहा : हे भरद्वाज, मुनीन्द्र विश्वामित्रजी के यों पूछने पर रामचन्द्रजी धैर्य…
  2. Verse 2रामजी ने कहा : भगवन्‌ यद्यपि मैं अज्ञानी हूँ, तथापि इस समय आपके पूछने पर सब कुछ कहूँगा, क…
  3. Verses 3–4यों अपनी विनीत वाणी से मुनि को अपने वश में करके रामचन्द्रजी अपने वृत्तान्त के अनुवाद के ब…
  4. Verse 5इस बीच में इस संसार पर आस्था को हरनेवाला यह विचार मेरे मन में उत्पन्न हुआ, जिसे मैं आपके…
  5. Verses 6–7तीर्थयात्रा करने के अनन्तर मेरा मन उक्त विवेक से पूर्ण हो गया। उससे सब विषय परिणाम में नी…
  6. Verse 8(शास्त्रकारों ने भी मृतिबीजं भवेज्जन्म जन्म बीजं भवेन्मृति:' यानी मरण में जन्म कारण है और…
  7. Verse 9होती हैं और शास्त्रों में जो निषिद्ध विषय है, वे तो स्वयं पापरूप ही हैं, अत: इन अस्थिर वि…
  8. Verse 10केवल विषयों का सम्बन्ध ही मन के द्वारा कल्पित नहीं है, किन्तु जीव के जन्म आदि भी मन के द्…
  9. Verses 11–12जैसे मरीचिका को जल समझकर मुग्ध मृग वन में बड़ी दूर तक इधर-उधर भटकते रहते हैं, फिर भी कुछ…
  10. Verse 13इस संसाररूप प्रपंच में ये जो अभागे भोग हैं, वे कौन चीज हैं कि हम लोग उनके व्यर्थ मोह से य…
  11. Verse 14जैसे अरण्य में किसी गड्ढे मेँ गिरे हुए मूढ मृग बहुत काल के बाद यह जानते हैं कि हम गड्ढे क…
  12. Verse 15मुझे राज्य से क्या ? इन भोगों से क्या ? मैं कौन हूँ और किसलिए आया हू ? जो मिथ्या है, वह म…
  13. Verses 16–21हे ब्रह्मन्‌, जैसे यत्रतत्र भ्रमण करनेवाले पथिक की मरुभूमि से आस्था हट जाती है, वैसे ही म…
  14. Verse 22संसार के विविध दुःखरूप पाषाण से मेरा अन्तःकरण जर्जर हो गया है, मैं अपने मित्रों ओर लोक से…
  15. Verse 23अश्लुरहित शुष्क रोदन से प्रीतिशून्य अतएव हर्षादिशून्य मेरे मुख के कृत्रिम स्मित, अभिलाप आ…
  16. Verse 24जैसे कोई पूर्व अवस्था में अनेक प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न भाग्यवान्‌ पुरुष दैव से आ…
  17. Verse 25वंचना से भरपूर यह लक्ष्मी अन्तःकरण की वृत्तियों को मुग्ध करती है, गुणों को नष्ट करती है औ…
  18. Verse 26धनियों को चिन्तारूप धार से खण्डशः काटने के लिए प्रवृत्त चक्ररूपी ये विविध धन मुझे आनन्द न…
  19. Verse 27जैसे भंगुर काष्ठ आदि से आच्छादित छोटे गर्त में गिरने के कारण प्राप्त क्षुधा, पिपासा आदि द…
  20. Verse 28अज्ञानरूपी रात्रि में अविचाररूपी निविड़ कुहरे से लोगों की ज्ञानरूपी ज्योति के नष्ट होने प…