Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अयःशलाकासदृशाः परस्परमसङ्गिनः ।
श्लिष्यन्ते केवलं भावा मनःकल्पनया स्वया ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
होती हैं और शास्त्रों में जो निषिद्ध विषय है, वे तो स्वयं पापरूप ही हैं, अत: इन अस्थिर विषयों से सुख
की अभिलाषा करना सर्वथा मूर्खता ही है ।)
लोहे की शलाकाओं के समान ये विषय परस्पर एक दूसरे से मिले जुले नहीं है, किन्तु केवल मन
की कल्पना से उनका सम्बन्ध जवर्दस्ती माना जाता है अर्थात् यह मेरे उपभोग का साधन है, इससे मैं
यह काम करूँगा, इस प्रकार की मन की कल्पना से उन विषयों का परस्पर क्रिया-कारणभाव से सम्बन्ध
माना जाता है, इसलिए लोगों को सुखकारकरूप से उनका जो भान होता है, वह केवल अज्ञानमूलक
मन से कल्पित ही है, इसलिए विषय दुःखरूप ही है, सुखरूप नहीं हैं