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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

विविधदोषदशापरिचिन्तनैर्विततभङ्गुरकारणकल्पितैः । मम न निर्वृतिमेति मनो मुने निगडितस्य यथा वनदन्तिनः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भंगुर काष्ठ आदि से आच्छादित छोटे गर्त में गिरने के कारण प्राप्त क्षुधा, पिपासा आदि दोषों के और गिरना, बाँधा जाना आदि दुर्दशाओं के विचार से बन्धन में पड़े हुए हाथी को सुख नहीं होता, वैसे ही देह आदि पदार्थों के भंगुरत्वरूप हेतु से जनित अनेक प्रकार के दोषों और दुर्दशाओं का स्मरणकर मुझे सुख नहीं होता