Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verses 16–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verses 16–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 16-21
संस्कृत श्लोक
एवं विमृशतो ब्रह्मन्सर्वेष्वेव ततो मम ।
भावेष्वरतिरायाता पथिकस्य मरुष्विव ॥ १६ ॥
तदेतद्भगवन्ब्रूहि किमिदं परिणश्यति ।
किमिदं जायते भूयः किमिदं परिवर्धते ॥ १७ ॥
जरामरणमापच्च जननं संपदस्तथा ।
आविर्भावतिरोभावैर्विवर्धन्ते पुनःपुनः ॥ १८ ॥
भोगैस्तैरेव तैरेव तुच्छैर्वयममी किल ।
पश्य जर्जरतां नीता वातैरिव गिरिद्रुमाः ॥ १९ ॥
अचेतना इव जनाः पवनैः प्राणनामभिः ।
ध्वनन्तः संस्थिता व्यर्थं यथा कीचकवेणवः ॥ २० ॥
शाम्यतीदं कथं दुःखमिति तप्तोऽस्मि चिन्तया ।
जरद्द्रुम इवोग्रेण कोटरस्थेन वह्निना ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, जैसे यत्रतत्र भ्रमण करनेवाले
पथिक की मरुभूमि से आस्था हट जाती है, वैसे ही मेरे इन सब विचारों से सभी भोग-साधन पदार्थो से
मेरा चित्त हट गया है । इसलिए भगवन्, आप यह बतलाइये कि यह दिखनेवाला जगत् सर्वात्मना नष्ट
अर्थात् असत् इसलिए हो जाता हे कि सत् ओर असत् का विरोध है ? यदि जगत् असत् है, तो वह फिर
कभी सत् होता है ? उसकी क्या वृद्धि होती है ? क्या जरा, मरण, आपत्ति, जन्म और सम्पत्ति ये सब
आविभवि ओर तिरोभाव से पुनः पुनः बढ़ते रहते हैं मुनिवर ! देखिये, हम लोग उन तुच्छ भोगो से ऐसे
जर्जर हो गये हैं, जैसे कि पर्वत के ऊपर के वृक्ष आँधी से जर्जर हो जाते है । जो बुद्धिमान् लोग हैं, वे भी
कुछ नहीं कर रहे है, इसलिए विवेकी ओर अविवेकी सभी प्राणी जैसे अचेतन बाँस की वेणु पवन के द्वारा
शब्द करती हे, वैसे प्राण नामक वायु से प्रेरित होकर व्यर्थ ही शब्द करते हैं, उनसे कुछ भी नहीं होता ।
जैसे पुराना वृक्ष अपने खोखले में रहनेवाली उग्र अग्नि से जल जाता हे, वैसे ही हे मुनिश्रेष्ठ मेरा इस
दुःख से छुटकारा कैसे होगा, ऐसी चिन्तारूप अग्नि से मेँ सदा जलता रहता हूँ