Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
संसारदुःखपाषाणनीरन्ध्रहृदयोऽप्यहम् ।
निजलोकभयादेव गलद्वाष्पं न रोदिमि ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार के
विविध दुःखरूप पाषाण से मेरा अन्तःकरण जर्जर हो गया है, मैं अपने मित्रों ओर लोक से डरकर
अभश्रुपूर्ण नेत्रों से नहीं रो रहा हूँ, क्योंकि यदि मैं रोना आरम्भ करूँ, तो वे भी रोने लगेंगे