Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verses 11–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
असतैव वयं कष्टं विकृष्टा मूढबुद्धयः ।
मृगतृष्णाम्भसा दूरे वने मुग्धमृगा इव ॥ ११ ॥
न केनचिच्च विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः ।
बत मूढा वयं सर्वे जानाना अपि शाम्बरम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मरीचिका
को जल समझकर मुग्ध मृग वन में बड़ी दूर तक इधर-उधर भटकते रहते हैं, फिर भी कुछ नहीं मिलता,
वैसे ही मूढ़बुद्धि हम लोग इस संसार में असत् पदार्थों को सुख के साधन समझकर इधर-उधर खूब
भटकते रहते हैं, पर हाथ कुछ नहीं लगता । यद्यपि हम लोग किसी के द्वारा बेचे नहीं गये हैं, तथापि बेचे
गये प्राणियों के समान परवश होकर बैठे हुए हैं, अत्यन्त खेद है कि माया को जानते हुए भी हम मूढ़ ही
हैं, क्योंकि उसकी कुछ चिन्ता नहीं करते