Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 3,4
संस्कृत श्लोक
अहं तावदयं जातो निजेऽस्मिन्पितृसद्मनि ।
क्रमेण वृद्धिं संप्राप्तः प्राप्तविद्यश्च संस्थितः ॥ ३ ॥
ततः सदाचारपरो भूत्वाहं मुनिनायक ।
विहृतस्तीर्थयात्रार्थमुर्वीमम्बुधिमेखलाम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यों अपनी विनीत वाणी से मुनि को अपने वश में करके रामचन्द्रजी अपने वृत्तान्त के अनुवाद के
बहाने से धर्मानुष्ठानजनित चित्त की शुद्धि से विवेक और वैराग्य होने पर मुझमें विचार का उदय हुआ,
ऐसा कहते हैं।
मैं यहाँ अपने पिताजी के घर में उत्पन्न हुआ, क्रम से बढ़ा और विद्या भी प्राप्त की । उसके बाद हे
मुनिनायक, सत् आचरणों के अनुष्ठान में तत्पर होकर तीर्थयात्रा के लिए समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के चारों
ओर विचरा