Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verses 6–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
विवेकेन परीतात्मा तेनाहं तदनु स्वयम् ।
भोगनीरसया बुद्ध्या प्रविचारितवानिदम् ॥ ६ ॥
किंनामेदं बत सुखं येयं संसारसंततिः ।
जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
तीर्थयात्रा करने के अनन्तर मेरा मन उक्त विवेक
से पूर्ण हो गया। उससे सब विषय परिणाम में नीरस हैं, ऐसी बुद्धि हुई और उस बुद्धि से मैंने विचार किया
कि यह जो संसार का प्रवाह है, यह क्या सुख का हेतु हो सकता है ? अर्थात् इस विस्तृत संसार से कभी
सुख नहीं मिल सकता, क्योंकि इसमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे मरने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और
जो मरते हैं, वे जन्म के लिए ही मरते हैं, उनको कुछ भी सुख नहीं मिलता