Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
भृशं मुह्यामि संस्मृत्य भावाभावमयीं स्थितिम् ।
दारिद्र्येणेव सुभगो दूरे संसारचेष्टया ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कोई पूर्व अवस्था में अनेक प्रकार की
सम्पत्तियों से सम्पन्न भाग्यवान् पुरुष दैव से आई हुई दरिद्रावस्था में अपनी पूर्वीय समृद्धि का स्मरण
कर मुग्ध होता है। वैसे ही मैं भी प्रियतम विषयों की विनाशप्राय अवस्था का या सब प्रकार के दुःखों के
उपशमरूप परमानन्द के अज्ञान की विकारभूत अवस्था का विचार कर इस सांसारिक चेष्टा से अत्यन्त
मुग्ध हो रहा हूँ