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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

मनःसमायत्तमिदं जगदाभोगि दृश्यते । मनश्चासदिवाभाति केन स्म परिमोहिताः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

केवल विषयों का सम्बन्ध ही मन के द्वारा कल्पित नहीं है, किन्तु जीव के जन्म आदि भी मन के द्वारा ही कल्पित हैं, इसलिए दृश्यमान सम्पूर्ण जगत्‌ मन से कल्पित ही है, यह कहते है । कृत्रिम वेष के समान दीखनेवाला यह सारा जगत्‌ मन की कल्पनामात्र है और वह मन भी विवेकज्ञान होने पर शून्य-सा ही प्रतीत होता है, अतः मन से भी हम सुख की आशा नहीं कर सकते, फिर हम लोगों को इतने समय तक “सुख होगा" इस प्रकार मोह में किसने डाल रक्खा है 2