Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
खलाः कालेकाले निशि निशितमोहैकमिहिकागतालोके लोके विषयशतचौराः सुचतुराः ।
प्रवृत्ताः प्रोद्युक्ता दिशिदिशि विवेकैकहरणे रणे शक्तास्तेषां क इव विदुषःप्रोज्झ्य सुभटाः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानरूपी रात्रि में अविचाररूपी निविड़ कुहरे से लोगों की ज्ञानरूपी ज्योति के नष्ट होने पर दूसरों को
दुःख देनेवाले बड़े चतुर सैकड़ों विषयरूपी चोर सदा चारों ओर विवेकरूपी मुख्य रत्न को चुराने के लिए
जीजान से लगे हुए हैं। युद्ध में उन्हे विनष्ट करने के लिए विद्वानों को (तत्त्वज्ञानियों को) छोड़कर कौन
से योद्धा समर्थ हो सकते हैं ? तत्त्वज्ञानी ही उनका विनाश करने में समर्थ हैं, दूसरे नहीं, क्योंकि तम
(अज्ञान और अन्धकार) का विनाश हुए बिना उनका वध होना असंभव है, यह भाव है