अलार्म बजने से पहले की पाँच मिनट की झपकी में कभी-कभी पूरी एक कहानी घट जाती है। अनजान शहर, पुराना दोस्त, छूटती ट्रेन। आँख खुलती है तो घड़ी कहती है कि बस पाँच मिनट बीते हैं, जबकि सपने के भीतर वे घंटों जैसे थे।
पिछली कड़ी में आकाशज ब्राह्मण की कथा थी, जिसे मृत्यु भी नहीं ले जा सकी, क्योंकि वह केवल चेतना से बना था। वसिष्ठ कह रहे थे कि यह जगत् चिदाकाश ही है, पर राम के चेहरे पर संदेह दिख रहा था। तब वसिष्ठ ने कहा, यह बात मन में बैठ जाए, इसके लिए मण्डप की कथा सुनो। राम ने कहा, संक्षेप में सुनाइए। वह "संक्षेप" ग्रंथ के छियालीस सर्गों में फैला है।
यह कथा उत्पत्ति प्रकरण के सर्ग १५ से ६० तक है। वसिष्ठ इसे राम को सुना रहे हैं, कथा के भीतर सरस्वती लीला को समझाती हैं, और बीच-बीच में राम सवाल पूछते हैं। घटनाएँ और उनका क्रम मूल ग्रंथ का है, उन्हें अपने शब्दों में कहने की छूट भर मैंने ली है। युद्ध के लंबे वर्णन दो-चार पंक्तियों में समेट दिए हैं।
कथा एक नज़र में
| ग्रंथ | श्री योगवासिष्ठ महारामायण (योग वशिष्ठ), उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग १५–६० |
|---|---|
| कौन सुना रहा है | वसिष्ठ, राम को (कथा के भीतर सरस्वती लीला को समझाती हैं) |
| मुख्य पात्र | रानी लीला, राजा पद्म (अगले लोक में विदूरथ), देवी सरस्वती, दूसरी लीला, पहाड़ी गाँव के ब्राह्मण वसिष्ठ और अरुंधती |
| समस्या | पति अमर नहीं हो सकते थे, तो लीला ने वर माँगा कि मरने पर उनका जीव महल से बाहर न जाए |
| एक घर, तीन संसार | पहाड़ी गाँव का ब्राह्मण (मरे आठ दिन), उसी घर के आकाश में राजा पद्म (बरसों का राज), पद्म के महल के आकाश में विदूरथ (मरे एक दिन, उम्र सत्तर बरस) |
| परिणाम | विदूरथ युद्ध में मरकर पद्म के शरीर में लौटे, और दोनों लीलाओं के साथ अस्सी हज़ार वर्ष राज करके मुक्त हुए |
| मुख्य शिक्षा | जिसे हम जाग्रत मानते हैं, वह भी भीतर का स्वप्न ही है, जो सचमुच किसी देश-काल को नहीं भरता (उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग ४२, श्लोक २३) |
अमर पति की चाह
बहुत पहले पद्म नाम का एक राजा था, और उसकी रानी थी लीला। ग्रंथ कहता है कि लीला पति का प्रतिबिंब थी: राजा दुखी तो वह दुखी, राजा सुखी तो वह सुखी। फ़र्क बस इतना था कि राजा क्रोध करते तो वह क्रोध नहीं करती थी, केवल डर जाती थी।
एक दिन लीला ने सोचा कि यह युवा राजा अजर-अमर कैसे हो। ज्ञानी ब्राह्मणों ने साफ़ कहा: "देवि, तप और जप से सारी सिद्धियाँ मिल सकती हैं, अमरता कभी नहीं।" तब लीला ने अपनी बुद्धि से दूसरा रास्ता निकाला। अगर मैं पहले मरी, तो दुखों से छूट जाऊँगी। और अगर:
अथ वर्षसहस्रेण भर्तादौ चेन्मरिष्यति ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग १६, श्लोक २७
तत्करिष्ये तथा येन जीवो गेहान्न यास्यति ॥
अर्थ: और अगर हज़ार वर्ष बाद ही सही, पति मुझसे पहले मरेंगे, तो मैं ऐसा उपाय करूँगी कि उनका जीव इस घर से बाहर न जाए।
पति से बिना कहे उसने सरस्वती की आराधना शुरू की। हर तीसरी रात के बाद भोजन, और ऐसे सौ व्रत, जबकि पति की सेवा पहले की तरह चलती रही। देवी प्रसन्न हुईं तो लीला ने दो वर माँगे: पति मरें तो उनका जीव इसी अंतःपुर के मण्डप से बाहर न जाए, और जब भी मैं पुकारूँ, आप दर्शन दें।
समय बीता, और रणभूमि में घायल राजा अंतःपुर में मर गए। तभी आकाशवाणी हुई: "शव को फूलों से ढक दो। न फूल मुरझाएँगे, न शव बिगड़ेगा। इनका जीव इस महल से बाहर नहीं जाएगा।"
यहाँ आधी रात, वहाँ दोपहर
उसी आधी रात लीला ने सरस्वती को पुकारा: "मेरे पति कहाँ हैं? मुझे उनके पास ले चलिए।" देवी ने कहा कि वासनाओं से भरे चित्ताकाश और इस भौतिक भूताकाश के बीच शुद्ध चिदाकाश है। सारे संकल्प छोड़कर मन उसमें टिकाओ, तो पहुँच जाओगी।
लीला समाधि में चली गई, और उसने पति को उसी महल के आकाश में देखा: सोलह बरस का युवा, बुढ़ापे से मुक्त, भरी सभा में सिंहासन पर। वहाँ दोपहर थी, जबकि लीला के महल में आधी रात थी। वह सभा में घूमती रही, पर किसी ने उसे नहीं देखा, जैसे किसी और के मन में बसा नगर दूसरा नहीं देख पाता। और चेहरे वही थे: वही मंत्री, वही पंडित, वही सेवक।
घबराकर वह लौटी और आधी रात को ही सभा बुलवा ली। सब आए, सब जीवित थे। तब उसने सरस्वती से पूछा कि ये लोग वहाँ भी हैं और यहाँ भी, जैसे पहाड़ दर्पण के भीतर भी दिखता है और बाहर भी। सच्ची सृष्टि कौन-सी है? बातचीत में लीला खुद इस नतीजे पर पहुँची कि पति का संसार इस संसार की स्मृति से बना है, और यह संसार भी किसी पिछली स्मृति का आकाश है। देवी ने कहा, ठीक कहा। और इसे दिखाने के लिए उन्होंने एक पहाड़ी गाँव की कथा शुरू की।
पहाड़ी गाँव का ब्राह्मण
एक पहाड़ के नीचे, नदियों और वनों से घिरे गाँव में वसिष्ठ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह इन्हीं वसिष्ठ जैसा था, बस इक्ष्वाकु कुल का पुरोहित नहीं था। पत्नी का नाम अरुंधती था। एक दिन पहाड़ की ढलान से उसने नीचे एक राजा को सेना के साथ शिकार पर जाते देखा, और मन में चाह उठी: "मैं कब ऐसा राजा बनूँगा?" वह संकल्प मन में बैठ गया।
बुढ़ापे में पति की मृत्यु पास देखकर अरुंधती ने, ठीक लीला की तरह, सरस्वती से वर माँगा कि पति का जीव मरने के बाद इसी मण्डप से बाहर न जाए। ब्राह्मण मरा, और घर के उसी आकाश में रहकर अपने पुराने संकल्प के बल से राजा बन गया। अरुंधती भी देह छोड़कर उसके पीछे चली गई। "उसे मरे आज आठवाँ दिन है, और उसका जीव गाँव के उसी घर में है।" फिर देवी ने कहा: "वही ब्राह्मण आज राजा बनकर तुम्हारा पति है, और अरुंधती तुम हो।"
लीला चकित थी: यह तो सरसों के दाने में ऐरावत बाँधने जैसा है। देवी ने कहा, पुरानी स्मृति लुप्त हुई और दूसरी उग आई, जैसे सपने में जागने की स्मृति खो जाती है। इसी को मरना कहते हैं। पर लीला की असली गाँठ दूसरी थी:
अष्टमे दिवसे विप्रः स मृतः परमेश्वरि ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग २०, श्लोक २७
गतो वर्षगणोऽस्माकं मातः कथमिदं भवेत् ॥
अर्थ: परमेश्वरी, वह ब्राह्मण तो आठ दिन पहले मरा है, और हमारे यहाँ बरसों के बरस बीत चुके हैं। माँ, यह कैसे हो सकता है?
देवी बोलीं: "जैसे देश की लंबाई नहीं होती, वैसे ही काल की लंबाई भी नहीं होती। इसका क्रम सुनो:"
अनुभूय क्षणं जीवो मिथ्यामरणमूर्च्छनम् ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग २०, श्लोक ३१
विस्मृत्य प्राक्तनं भावमन्यं पश्यति सुव्रते ॥
अर्थ: सुव्रते, जीव क्षण भर के लिए मृत्यु की झूठी मूर्छा का अनुभव करता है, पिछले भाव को भूल जाता है और कुछ और देखने लगता है।
पलक झपकते ही वह सोचता है: मैं इस पिता का पुत्र हूँ, मेरी इतनी उम्र है, मैं जन्मा, बालक था, बड़ा हुआ। ये यादें उस क्षण के बाद उगती हैं, जैसे फूल के बाद फल। मुझे यहाँ सबसे चौंकाने वाली बात यह लगती है कि "अतीत" वर्तमान के साथ ही रचा जाता है।
बित्ते भर आकाश की यात्रा
लीला वह गाँव देखना चाहती थी। देवी ने कहा, इस शरीर-भाव के साथ नहीं, इसे भुलाकर शुद्ध चेतना में टिको। उसी रात फूलों में ढके शव के पास दोनों समाधि में बैठीं और हाथ पकड़कर आकाश में उड़ीं: बादल, सिद्धों के लोक, अंधकार की परतें, ब्रह्माण्ड की दीवारें। फिर वसिष्ठ एक वाक्य में सब पलट देते हैं: वे कहीं दूर नहीं गई थीं, यह सारी यात्रा उसी घर के बित्ते भर आकाश में हुई।
ब्राह्मण के घर में हर चेहरा उदास था। अब सत्यसंकल्प हो चुकी लीला ने चाहा कि घर वाले उन्हें देखें। बड़े बेटे ज्येष्ठशर्मा ने उन्हें वनदेवियाँ समझकर फूल चढ़ाए और माता-पिता के जाने का दुख कहा। लीला ने उसके सिर पर हाथ रखा और दुख चला गया।
गाँव में घूमते हुए उसे सब याद आता गया: "यह मेरी बछिया है, मेरे जाने के बाद इसने घास छोड़ दी। यहाँ मैं सोती थी।" उसे अपने आठ सौ पिछले जन्म भी याद आए। और फिर: "इन्होंने जल्दी राजा बनने की चाह की थी, इसलिए आठ ही दिनों में वह राज पा लिया जो बरसों का लगता है। इस अँगूठे भर गृहाकाश को मैं करोड़ों योजन का राज्य समझती रही।"
राम ने पूछा, वे वज्र जैसी ब्रह्माण्ड की दीवार से निकलीं कैसे? वसिष्ठ बोले: "कहाँ ब्रह्माण्ड, कहाँ दीवार? वे उसी अंतःपुर के आकाश में थीं, जैसे बिस्तर पर सोया आदमी एक सपने से दूसरे में चला जाता है।"
एक दिन, सत्तर बरस
लौटकर लीला संकल्प के शरीर से पति के अगले संसार में उतरी। वहाँ पति के राज्य पर एक सामंत राजा ने चढ़ाई की थी, और सर्ग ३१ से ४० उसी युद्ध के वर्णन में जाते हैं। रात हुई तो दोनों देवियाँ राजा के कक्ष में पहुँचीं। राजा जागा, ज़मीन पर पद्मासन लगाकर बैठा और फूल चढ़ाकर उनकी स्तुति की। सरस्वती के पूछने पर मंत्री ने बताया कि ये इक्ष्वाकु वंश के नभोरथ के पुत्र महाराज विदूरथ हैं, और दस बरस के थे तभी पिता इन्हें राज देकर वन चले गए।
सरस्वती ने "राजन्, अपना पिछला जन्म याद करो" कहते हुए उसके सिर पर हाथ रखा। राजा को सब याद आ गया, और वह बोला, "देवियो, यह क्या है? मुझे मरे तो एक ही दिन हुआ है..."
गतमद्येह जातानि वयो वर्षाणि सप्ततिः ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ४१, श्लोक ३०
स्मराम्यनेककार्याणि स्मरामि प्रपितामहम् ॥
अर्थ: (मुझे मरे एक दिन) आज ही बीता है, और यहाँ मेरी उम्र के सत्तर बरस हो चुके हैं। मुझे अनेक काम याद हैं, अपने परदादा तक याद हैं।
सरस्वती ने समझाया कि मृत्यु की मूर्छा के ठीक बाद, उसी मुहूर्त में, उसी घर के आकाश में यह सब तुम्हारे भीतर उग आया। ब्राह्मण के घर में मण्डप है, उसमें पद्म का संसार, उसमें तुम्हारा यह घर। सत्तर बरस की पूरी कहानी उसी एक क्षण की प्रतीति है, जैसे सपने के एक मुहूर्त में सौ बरस का भ्रम हो जाता है।
यहाँ राम ने वसिष्ठ से कहा कि उनकी समझ यह बनी है कि सपना देखने वाला जाग भी जाए, तो उसका स्वप्न-नगर वैसा ही बना रहता है। वसिष्ठ ने हामी भरी, और फिर बात उलट दी:
एतदास्तामिदं तावद्यज्जाग्रदिव मन्यसे ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ४२, श्लोक २३
विद्धि तत्स्वप्नमेवान्तर्देशकालाद्यपूरकम् ॥
अर्थ: यह बात अभी रहने दो। जिसे तुम जाग्रत जैसा मानते हो, उसे भी भीतर का स्वप्न ही जानो, जो देश और काल को सचमुच नहीं भरता।
यानी सवाल यह नहीं कि विदूरथ का संसार कम सच्चा है। सवाल यह है कि हमारा संसार उससे ज़्यादा सच्चा नहीं है।
दर्पण में दूसरी लीला
विदूरथ ने देवी से वर माँगा कि वह जहाँ जाए, उसका मंत्री और कुँवारी बेटी भी साथ आएँ। देवी ने कहा, "तुम इसी युद्ध में मरोगे और पिछले जन्म का राज्य पाओगे। वे दोनों भी वहीं पहुँचेंगे।" तभी दूत ने ख़बर दी कि शत्रु राजधानी में घुस आया है और नगर जल रहा है। रानी भीतर आई, और विदूरथ उसे देवियों के पास छोड़कर लड़ने चला गया।
पहली लीला ने उस रानी को देखा, जैसे दर्पण में अपना प्रतिबिंब। सरस्वती ने बताया कि तुम्हारे पति जिस वासना के साथ मरे थे, उसी से यह दूसरी लीला उनकी कल्पना में तुम्हारे ही रूप में उगी है। यह रानी सरस्वती की भक्त निकली और उसने वर माँगा कि पति मरकर जहाँ जाएँ, वह इसी देह से वहाँ उनकी पत्नी बने। देवी ने कहा, ऐसा ही होगा।
पहली लीला ने पूछा, तो मुझे आपने इसी शरीर से गाँव क्यों नहीं पहुँचाया? सरस्वती का उत्तर इस कथा का एक ज़रूरी सूत्र है: "मैं किसी का कुछ नहीं करती। हर जीव अपनी चाह खुद पूरी करता है। तुम्हारे भीतर बहुत समय से यह भाव था कि मैं मुक्त हो जाऊँ, इसलिए मैंने तुम्हें जगाया। यह अपने पति को चाहती है, इसे वही मिलेगा।"
फिर दोनों लीलाओं ने पूछा कि आपकी कृपा के बावजूद हमारे पति जीत क्यों नहीं रहे। देवी ने कहा, "शत्रु राजा सिंधु ने जीत के लिए मेरी आराधना की है, विदूरथ ने 'मैं मुक्त हो जाऊँ' इस भाव से। जो मुझे जिस ओर प्रेरित करता है, मैं उसके लिए वही फल बन जाती हूँ। इसलिए सिंधु जीतेगा, और विदूरथ समय आने पर तुम दोनों के साथ मुक्त होगा।"
युद्ध, मूर्छा और वापसी
सर्ग ४३ से ५१ तक नगरदाह और युद्ध है। अंत यह है कि सिंधु ने विदूरथ को बुरी तरह घायल किया और सारथी उसे घर भगा लाया। सरस्वती की उपस्थिति से भरे उस घर में सिंधु घुस नहीं सका। उधर पति की दशा देखकर दूसरी लीला मूर्छित हुई, और उसी क्षण, बेटी के दिखाए रास्ते से, पति से पहले ही पद्म के शव के पास जा पहुँची। उसने समझा कि थके हुए पति सो रहे हैं, और उन पर चँवर डुलाने लगी।
फिर विदूरथ के प्राण निकले। यम ने उसके कर्म देखकर कहा कि इसने कोई पाप नहीं किया, इसे फूलों से ढके मण्डप में पड़े इसके पिछले शरीर में जाने दो। दोनों देवियाँ उसके पीछे-पीछे चलीं। मण्डप में पहुँचकर पहली लीला ने पूछा, यहाँ कितना समय बीता? सरस्वती बोलीं, "एक महीना। तुम्हारा छोड़ा हुआ शरीर गलने लगा था, तो मंत्रियों ने उसे जला दिया। अब तुम्हें देखेंगे तो सोचेंगे कि रानी परलोक से लौट आई।"
सरस्वती ने रोककर रखा हुआ जीव छोड़ा, और वह पद्म की नासिका में समा गया। राजा उठा: "कौन है?" दोनों लीलाएँ आगे आईं, एक-सा रूप, एक-सी बोली। पहली ने कहा, "मैं आपकी पिछले जन्म की पत्नी लीला हूँ, और यह आपकी दूसरी पत्नी है, जिसे मैं आपके लिए लाई हूँ।" सुबह महल में उत्सव हुआ। सरस्वती के दिए ज्ञान से जागे पद्म ने दोनों लीलाओं के साथ अस्सी हज़ार वर्ष राज किया। तीनों जीवन्मुक्त थे, और अंत में विदेहमुक्त हुए।
आठ दिन, एक महीना, सत्तर बरस
कथा पूरी करके वसिष्ठ ने इसका प्रयोजन कहा:
एतत्ते कथितं राम दृश्यदोषनिवृत्तये ।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ६०, श्लोक १
लीलोपाख्यानमनघं घनतां जगतस्त्यज ॥
अर्थ: राम, यह निर्मल लीला उपाख्यान मैंने तुम्हें दृश्य के दोष को मिटाने के लिए सुनाया है। अब जगत् को ठोस मानना छोड़ दो।
राम का एक संदेह बाकी था: एक ही समय कहीं आठ दिन कहा गया, कहीं एक महीना, कहीं बरसों। वसिष्ठ ने कहा, जिसे जो जिस ढंग से प्रतीत होता है, वह उसे वैसा ही अनुभव करता है। दुखी की रात कल्प जैसी लंबी होती है, सुखी की क्षण भर की, और हरिश्चंद्र की एक रात बारह वर्ष की हो गई थी। और जो निर्विकल्प समाधि में टिका है, उसके लिए न दिन है, न रात।
मूल संदेश
यह कथा एक घर के भीतर तीन संसार रखती है। पहाड़ी गाँव का ब्राह्मण आठ दिन पहले मरा। उसी घर के आकाश में राजा पद्म ने बरसों राज किया। और पद्म के अंतःपुर के आकाश में विदूरथ ने सत्तर बरस जिए, जबकि पद्म को मरे एक दिन हुआ था। तीनों गिनतियाँ अपने-अपने भीतर सच्ची थीं, और कोई एक घड़ी नहीं थी जो तीनों को नाप सके।
सरस्वती की व्याख्या इसकी जड़ तक जाती है। मृत्यु क्षण भर की मूर्छा है, उसके बाद नई स्मृति उगती है, और वह स्मृति अपने साथ पूरा अतीत रचकर लाती है: माता-पिता, बचपन, परदादा, सत्तर बरस। इसलिए "कितना समय बीता" का उत्तर बाहर की किसी घड़ी में नहीं, उस मन में है जो अनुभव कर रहा है। देश की लंबाई भी ऐसी ही है: करोड़ों योजन का राज्य बित्ते भर के आकाश में समाया है।
और वसिष्ठ की कसौटी इसे पूरा करती है: जिसे हम जाग्रत मानते हैं, वह भी भीतर का स्वप्न है। लीला की कथा का प्रयोजन दृश्य के दोष को मिटाना है, यानी उस आदत को ढीला करना जो जगत् को ठोस और अंतिम मान बैठती है। जगत् दिखना बंद नहीं होता, लीला भी अस्सी हज़ार वर्ष राज करती है। बस उसकी पकड़ छूट जाती है।
जीवन में उपयोग
अस्पताल के गलियारे में बीता एक घंटा पूरे दिन जैसा लगता है, और छुट्टी का हफ़्ता एक शाम जैसा। घड़ी दोनों बार ठीक चल रही थी, लंबाई मन ने गढ़ी थी।
इसलिए जब कोई समय बहुत भारी लगे, तो पहले बस इतना देखिए कि घड़ी क्या कह रही है और मन क्या कह रहा है। फिर पूछिए कि यह लंबाई किस भाव से बनी है: दुख, इंतज़ार, डर या ऊब। सरस्वती की भाषा में, जिसका प्रिय दूर हो उसे एक दिन बरस लगता है। भाव पहचान में आ जाए, तो आधा बोझ वहीं उतर जाता है।
फिर देखिए कि मन किस "दुनिया" को पक्का मान बैठा है: कोई पद, पुरानी पहचान, या यह कहानी कि मेरे साथ हमेशा ऐसा ही होता है। विदूरथ को परदादा तक याद थे, फिर भी वह इतिहास एक क्षण में गढ़ा गया था। हमारी कई "पुरानी" कहानियाँ भी आज के मन की रचना होती हैं।
यह साफ़ न दिखे, तो सरस्वती का बताया अभ्यास कीजिए: उसी पर सोचना, उसकी चर्चा करना, दूसरों को समझाना। अगर दिख जाए, तो जो काम सामने है उसे पूरे मन से कीजिए, बस उसे अंतिम मत मानिए। पद्म ने अस्सी हज़ार वर्ष राज किया, पर जीवन्मुक्त होकर।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| चिदाकाश | शुद्ध चेतना का आकाश, जिसमें सारे लोक कल्पित हैं | The space of pure consciousness in which all worlds appear |
| चित्ताकाश | वासनाओं और कल्पनाओं से भरा मन का आकाश | The mind-space filled with tendencies and imaginings |
| मण्डपाकाश | ब्राह्मण के घर के मण्डप का आकाश, जिसमें पूरी कथा के संसार समाए हैं | The hall-space of the brahmin's house that holds all the story's worlds |
| आतिवाहिक देह | मन से बना सूक्ष्म शरीर, जिससे जीव एक लोक से दूसरे में जाता है | The subtle mind-made body that carries the self between worlds |
| सत्यसंकल्प | वह अवस्था जिसमें मन का संकल्प तुरंत सच हो जाता है | The state in which one's intention becomes fact at once |
| प्रतिभा | चेतना में अपने-आप उगने वाली प्रतीति, जो पूरा संसार रच देती है | Spontaneous appearance in consciousness that projects a whole world |
| दृश्यदोष | दिखने वाले जगत् को ठोस और सत्य मान लेने की भूल | The error of taking the seen world as solid and real |
Sources
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग १५–२२ (पद्म और लीला, सरस्वती के वर, पहली समाधि, ब्राह्मण वसिष्ठ और अरुंधती, मृत्यु और काल)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग २३–३० (आकाश-यात्रा, पहाड़ी गाँव और ज्येष्ठशर्मा, पिछले जन्मों की स्मृति, ब्रह्माण्डों का दर्शन)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ३१–४० (विदूरथ के राज्य में पहुँचना और युद्ध का वर्णन)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ४१–४२ (विदूरथ की पूर्वजन्म-स्मृति, स्वप्न और जाग्रत पर राम-वसिष्ठ संवाद)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ४३–५१ (वरदान, नगरदाह, दूसरी लीला, सिंधु से युद्ध और विदूरथ की हार)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ५२–५७ (दूसरी लीला की यात्रा, मृत्यु का विवेचन, विदूरथ की मृत्यु और मण्डप में वापसी)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ५८–५९ (पद्म का पुनर्जीवन, दोनों लीलाएँ, राज्य और मुक्ति)
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ६० (उपाख्यान का प्रयोजन और काल की विषमता का कारण)