Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 41
चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसवों सर्म सोकर जागे हुए राजा द्वारा घर में प्रविष्ट हुई देवियों का पूजन तथा राजा के वंश का पूर्वजन्म की स्मृति का ओर ज्ञप्ति द्वारा आत्मोपदेश का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, उन दो देवियों के प्रविष्ट होने पर राजा पद्म के घर क…
- Verse 2उसमें स्पर्श होने पर बड़े भले लगनेवाले ओर निर्मल सुगन्धिवाले मृदु मन्दार पवन बहने लगे । उ…
- Verse 3वह सुन्दरता में नन्दन वन के तुल्य हो गया, व्याधि, पीडा उससे दूर हो गई, वसंत के उल्लाससे य…
- Verse 4चन्द्रमा के द्रव के समान शीतल उनकी देह के कान्ति पटल से, अमृत से सिक्त हुए की नाई, आद्लाद…
- Verses 5–6उसने दो आसनो पर बैठी हुई मेरु के दो शिखरो पर उदित हुए दो चन्द्रविम्बों की नाई, दो अप्सराओ…
- Verses 7–8उसने सोते समय इधर-उधर अस्त-व्यस्त हुए माला, हार ओर धोती को अपने-अपने स्थान पर ठीक किया, स…
- Verse 9हे देवियों, आपकी जय हो, आप दोनों जन्म, दुःखमयजाल ओर त्रिविध तापरूपी दाह-दोष को दूर करने क…
- Verse 10यह कहकर राजा ने, जैसे कमल थे वैसे ही, उनके चरणकमलों पर पुष्पांजलि अर्पित की
- Verses 11–12देवी सरस्वती ने, लीला के प्रति राजा का जन्मवृत्तान्त कहने के लिए, संकल्प से पास में स्थित…
- Verse 13देवी ने राजा से कहा : हे राजन्, आप कौन हैं, किसके पुत्र हो और कब यहाँ उत्पन्न हुए ? इस प…
- Verse 14हे देवियों, यह आप लोगों का ही प्रसाद है कि जो मैं आपके सामने भी बोलने में समर्थ हो रहा हू…
- Verses 15–20पहले ईक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा श्रीमान् कुन्दरथ थे, “उनके कमल के सदृश विशालनेत्…
- Verse 21हे देवियों, तभी से लेकर ये धर्मपूर्वक भूतल का पालन कर रहे हैँ । आज हमारे पुण्यरूपी वृक्ष…
- Verses 22–25हे देवियों बड़े भारी तप आदि सैकड़ों क्लेशो से भी आपके दर्शन मिलना कठिन हैं। इस प्रकार दर्…
- Verse 26देवी सरस्वती के स्पर्श करने पर राजा पद्म का हृदय बाहर-भीतर प्रकाशपूर्ण हो गया । राजा ने अ…
- Verses 27–28राजा ने लीला के विलास (कर्तव्य) के साथ-साथ शरीर ओर एकच्छत्र राज्य के त्याग को, कभी पहले अ…
- Verses 29–33प्रधान राजसदन के अन्दर आकाश में ही यह ब्रह्माण्डमण्डप हे । उस ब्रह्माण्डमण्डप के अन्दर यह…
- Verse 34शका - तो क्या वही ब्रह्माण्ड जगत् इस प्रकार प्रतीत होता है ? समाधान - नहीं, प्रत्येक यान…
- Verses 35–44उसी ब्राह्मणगृह में उसी मण्डप में उसका (तुम्हारे जीव का) भूतल है उसी घर के अन्दर यह परिदृ…
- Verses 45–50मैं सम्पूर्ण दुःखों के उपरत होने से शान्त होऊँगा, निरतिशय सुख की समृद्धि होने से मुक्त हो…
- Verses 51–53जैसे मनोरथ में जीवन ओर मरण होते हैं, जैसे गन्धर्वनगर मे भीत ओर भीत को शोभित करनेवाले चित्…
- Verse 54तब परमार्थ वस्तु क्या है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर देवी कहती है । वास्तव में न तो तुम कभी उत…
- Verses 55–56दृश्य के मिथ्या होने पर दृश्यसंवलित चिदाभासरूप दृश्यदर्शन भी मिथ्या ही है, यों विषयशून्य…
- Verses 57–63अल्पतर मे महत्तर वस्तुका न समा सकना ही प्रपंच के मिथ्यात्व का कारण है, इस आशय से कहते हैं…
- Verses 64–69जो शुद्ध बोधस्वरूप हैं, ऐसे चिदाकाशरूपी पुरुषों की दृष्टि से यह जगत् समबन्धी कुछ भी पदार…