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योग वासिष्ठ की कथाएँ

श्री योगवासिष्ठ महारामायण (योग वशिष्ठ) में महर्षि वसिष्ठ श्रीराम को आत्मज्ञान का उपदेश देते हैं, और यह उपदेश ज़्यादातर कथाओं के सहारे आगे बढ़ता है। पूरा ग्रंथ वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज को सुनाते हैं।

इस शृंखला में ये कथाएँ उसी क्रम में आती हैं जिसमें वे ग्रंथ में हैं। हर कड़ी में कथा मूल के क्रम से चलती है। बीच-बीच में चुने हुए श्लोक अर्थ के साथ हैं, और अंत में कथा का संदेश, जीवन में उसका उपयोग और सर्गों के संदर्भ। हर कथा अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।

अब तक की कड़ियाँ

  1. कड़ी 1

    राम का विषाद — योग वासिष्ठ की वह कथा जहाँ से सारा उपदेश शुरू होता है

    तीर्थयात्रा से लौटे सोलह वर्ष के राम चुप और उदास रहने लगे। योग वासिष्ठ की यह कथा बताती है कि विश्वामित्र ने उस उदासी को मोह नहीं, बोध क्यों कहा।

    वैराग्य प्रकरण · सर्ग ३–३३

  2. कड़ी 2

    शुकदेव और राजा जनक — योग वासिष्ठ की वह कथा जहाँ जानना काफ़ी नहीं था

    व्यास-पुत्र शुकदेव सत्य जान चुके थे, फिर भी मन अशांत था। योग वासिष्ठ की यह कथा बताती है कि राजा जनक ने तीन परीक्षाओं के बाद उन्हें विश्राम कैसे दिया।

    मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण · सर्ग १–२

  3. कड़ी 3

    आकाशज ब्राह्मण — योग वासिष्ठ की वह कथा जहाँ मृत्यु खाली हाथ लौटी

    सबको खाने वाली मृत्यु एक ब्राह्मण को छू तक न सकी। योग वासिष्ठ की इस कथा में यम बताते हैं कि मृत्यु की पकड़ कर्म और देह के अभिमान से बनती है।

    उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग १–३

  4. कड़ी 4

    लीला उपाख्यान — योग वासिष्ठ की वह कथा जहाँ एक दिन में सत्तर बरस बीते

    जिस ब्राह्मण को मरे आठ ही दिन हुए थे, वही राजा बनकर बरसों जी चुका था। योग वासिष्ठ की लीला उपाख्यान कथा दिखाती है कि देश और काल मन की कल्पना हैं।

    उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग १५–६०

  5. कड़ी 5

    कर्कटी राक्षसी — योग वासिष्ठ की वह कथा जहाँ एक बूँद से पेट भरा, मन नहीं

    पूरी दुनिया निगलने के लिए राक्षसी कर्कटी तप करके सुई बनी, पर एक बूँद से पेट भरा, तृष्णा नहीं। योग वासिष्ठ की यह कथा बताती है कि उसे शांति कहाँ मिली।

    उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग ६८–८३

नई कड़ियाँ इसी सूची में जुड़ती जाएँगी।