Guru's AddaGuru's Adda

Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 58

सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अद्जावनवाँ सर्ग समय, समाधि में स्थित लीला की देह का विनाश, लीला के साथ सम्भाषण और राजा पद्म के पुनः जीने का वर्णन ।

29 verse-groups

  1. Verse 1इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के प्रासंगिक प्रश्नों का समाधान कर प्रक्रत कथा के अवशिष्ट अंश क…
  2. Verse 2लीला ने कहा : हे देवि, इस पाद्म सृष्टि में इस मन्दिर में मेरी समाधि में और राजा पद्म की श…
  3. Verse 3श्रीसरस्वती देवीजी ने कहा : भद्रे, इस सृष्टि में, इस राजमहल में एक महीना व्यतीत हुआ। ये त…
  4. Verses 4–7चिता में रखकर घृत के साथ उसे सहसरा जला डाला
  5. Verses 8–9तदनन्तर तुम्हारे परिवार ने महारानी मर गई, यो जोर से रो-पीटकर सम्पूर्ण ओध्वदेहिक क्रिया की…
  6. Verse 10हे पुत्री, तुम अपने सत्यसंकल्पवश अत्यन्त स्वच्छ आतिवाहिक शरीर से, जिसे मनुष्य नहीं देख सक…
  7. Verse 11यदि किसीको यह शंका हो कि दिव्य शरीर पूवदेह के आकारवाला नहीं होगा, तो लोगों को उसमें “यही…
  8. Verses 12–14यदि मुझे उस देह की वासना थी, तो राजा की नाई मुझे वही देह क्यो नहीं मिला ? इस पर कहती हैं।…
  9. Verse 15जिनमें आतिवाहिकता बद्धमूल है, ऐसे सभी शरीर जलरहित शरत्कालीन मेघ के तुल्य और गन्धहीन पुष्प…
  10. Verses 16–17वासनायुक्त (& ) पुरुष में आतिवाहिकभाव के बद्धमूल होने पर जैसे यौवनावस्था में गर्भ में निव…
  11. Verse 18हे लीले, आओ, तबतक अपने सत्य संकल्प के विलास से इस लीला को अपना स्वरूप दिखायें और हमारा मा…
  12. Verse 19श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इन हमको (लीला और सरस्वती देवी को) विदूरथ की प…
  13. Verse 20उनके दृश्य होने के बाद विदूरथ-लीला &. वासना का अत्यन्त उच्छेद होने पर आतिवाहिक देह की कल्…
  14. Verses 21–22द्रव से शीतल दीप्ति के कारण चन्द्रमा के बिम्बसे निकाले गये-से और उनकी कान्तिरूपी द्रवसे य…
  15. Verses 23–24हे देवियों, आप मेरी विजयके लिए यानी कल्याणके लिए आई हैं और आप जीवन देनेवाली हैं आपकी जय ह…
  16. Verses 25–27श्रीसरस्वती देवी ने कहा : हे पुत्रि, पहले से आरम्भ कर तुम यह बताओ कि तुम यहाँ कैसे आई, रा…
  17. Verses 28–33हे परमेश्वरी, तदनन्तर मरणमूछकि बाद मैं क्या देखती हूँ कि वासना से परिकल्पित देह के तुल्य…
  18. Verses 34–37तदुपरान्त मैंने इस महल को देखा जो नायक (शवरूप राजा पद्म) से अलंकृत था, इसमें दीपक जलते थे…
  19. Verse 38उसके सब अंग सरस (हरेभरे) होकर ऐसे शोभित होने लगे, जैसे कि पर्वत की लताएँ वसन्त आने पर शोभ…
  20. Verse 39ओर मुखरूपी चन्द्रकिरणों से पृथिवी को खूब प्रकाशित करता था
  21. Verse 40जैसे वसन्त सुवर्ण के तुल्य उज्ज्वल कान्तिवाले अपने पल्‍लवों को संचालित करता है, वैसे ही र…
  22. Verse 41निर्मल चंचल तारिकावाले अपने सुन्दर नेत्रों को उसने यों खोला जैसे भुवन (भुवनात्मा हिरण्यगर…
  23. Verses 42–43राजा, जिसका शरीर शोभित हो रहा था, विन्ध्याचल के समान बुद्धिमान था, उठा और मेघ के घोष के स…
  24. Verse 44उसने नम्र दो लीलाओं को अपने सामने उपस्थित देखा । उन दोनों का एक-सा व्यवहार एक-सा आकार, एक…
  25. Verses 45–46उसने देखते हुए तुम कौन हो और यह कौन है तथा यह कहाँ से आई है, ऐसा पूछा, उससे पूर्व लीला ने…
  26. Verse 47यह लीला तुम्हारी दूसरी पत्नी है, मैंने तुम्हारी क्रीड़ा के लिए (उपभोग के लिए) इसका उपार्ज…
  27. Verse 48हे देव, यह स्वर्णसिंहासन के सिरहानेपर बैठी हुई है, इसकी आप रक्षा कीजिये । यह सरस्वती देवी…
  28. Verse 49हम लोगों के पुण्यों की प्रचुरता से यह साक्षात्‌ यहाँ पर उपस्थित हैं । हे राजन्‌, ये ही हम…
  29. Verses 50–53कमल के तुल्य विशाल नेत्रवाला राजा यह सुनकर उठकर देवी के चरणों में गिर पड़ा । उसके वस्त्र…