Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 15
चौढहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग बार-बार दृष्टान्त और विविध युक्तियों द्वारा चित् और चेत्य के अभेद का ज्ञान कराने के लिए मण्डपाख्यान का आरम्भ ।
19 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, यह जगत् चिदाकाशरूप ही है। शंका : यदि यह चिदाकाशरूप ही है…
- Verse 2त्रिजगत्रूपी प्रतिमा गढ़े बिना ही प्रतीत-सी होती है, क्योकि जैसे पत्थर के खम्भे में प्रति…
- Verse 3जैसे समुद्र में जल का स्पन्द (स्फुरण) जलस्वभाव से च्युत हुए बिना ही लहर-सा प्रतीत होता है…
- Verse 4यद्यपि मूढ पुरुषों की दृष्टि मे जगत् विशाल प्रतीत होता है, पर वास्तव में, विद्वानों की द…
- Verse 5प्रतीति कराता है
- Verses 6–7ब्रह्म के भेद से जगत् का भान नहीं होता है, इस कथन में प्रत्यक्षानुभव से विरोध का परिहार…
- Verse 8जैसे मरुभूमि में भ्रान्तिरूपिणी नदी प्रतीत होती है, वैसे ही पूर्वोक्त रीति से आकार रहित अ…
- Verse 9जगत् की जो दृश्यता हे, साक्षीरूप चैतन्य में एक ओर उसे ओर दूसरी ओर स्वप्न को रख कर सार ओर…
- Verse 10अज्ञानियों की दृष्टि से ही ब्रह्म आदि शब्दों के अर्थ से जगत् शब्दके अर्थ का भेद है, तत्त…
- Verse 11जब जगत् और ब्रह्म में को भेद ही नहीं है, तब तत्त्वज्ञानियों को जगत् की अपेक्षा (जगत् स…
- Verse 12यदि शंका हो कि दृश्य अत्यन्त मलिन है, वह अति स्वच्छतम चिन्मात्र कैसे हो सकता है? तो इस पर…
- Verse 13इस कथन से यह निष्कर्ष निकला कि अचेत्य (चेत्यभिन्न) चिद्रूप यह जगत् केवल व्योम (आकाश) ही…
- Verse 14इसलिए यहाँ जगत् आदि कुछ भी दृश्य उत्पन्न नहीं हुआ हे, नाम और रूप से रहित चिद्रूप ब्रह्म…
- Verse 15उक्त रीति से मायारूप आकाश मेँ स्थित यह जगत् आवरण शून्य चिदाकाश ही है । यह चित् से अणुमा…
- Verse 16यदि किसी को शंका हो कि विशालतम जगत् आकाश के समान शून्यप्राय चित्त की वासनाओं में कैसे अन…
- Verse 17पूर्व मे जो उपदेश दिया गया है, उसके विषय मे रामचन्द्रजी को सन्देह, अज्ञान ओर अनिश्चय है,…
- Verse 18श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, सत्-चिदानन्दमय ब्रह्म के बोध की सिद्धि के लिए सम्पूर…
- Verse 19श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, प्राचीन काल में इस भूतल में पद्म नामका राजा हुआ । व…
- Verses 20–31जैसे समुद्र अपनी वेलारूपी मर्यादा का पालन करते हैं, कभी उसका उल्लंघन नहीं करता, वैसे ही व…