Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 23
बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग पर्वत-ग्राम को देखने की इच्छा से समाधि द्वारा स्थूल देह का परित्याग कर देवीजी ओर लीला का विशाल आकाश में गमन-वर्णन |
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- Verses 1–7श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, वे दोनों उत्तम देवियाँ यानी सरस्वती और लीला उस रात्रि में परस…
- Verses 8–10दृश्य के आत्यन्तिक उपशम से (विनाश से) निर्विकल्प समाधि होने पर तत्त्वसाक्षात्कार से समूल…
- Verse 11देवी सरस्वती का ज्ञानदेह है, उसीसे वे विचरण कर सकती थीं, फिर उन्हें समाधिस्थ क्यों होना प…
- Verse 12आगे सर्ग में कहे जानेवाले आकाशगमन में देवी सरस्वती और लीला के देहवैलक्षण्य को कहते हैं। ज…
- Verse 13वह दूर आकाश में गमन की कल्पना अपने घर के मण्डप के वित्तेभर आकाश में ही हुई न कि बाहर, ऐसा…
- Verse 14उसके अनन्तर सुन्दर नयनवाली और वनितोचित विलासों से मनोहर वे दोनों ललनाएँ विषयज्ञान के स्वभ…
- Verse 15तदुपरान्त उसी घर में स्थित होकर “हम लोग आकाश में संचरण करें“ इत्याकारक चित्प्रधान मानस क…
- Verse 16चिदाकाश देह की प्राप्ति होने पर भी चित्त में स्थित पूर्व संकल्पित दृश्य के अनुसन्धान की अ…