हममें से ज़्यादातर लोग किसी एक चीज़ के बारे में मानकर चलते हैं कि बस वह मिल जाए, फिर चैन आ जाएगा। कोई नौकरी, कोई घर, किसी का हाँ कह देना। फिर वह मिल भी जाती है, कुछ दिन अच्छा लगता है, और भीतर की भूख वहीं की वहीं खड़ी मिलती है। कभी-कभी यह भी समझ आता है कि उसे पाने के लिए हमने ख़ुद को काफ़ी छोटा कर लिया था।

पिछली कड़ी में रानी लीला की कथा थी। उसके बाद राम ने वसिष्ठ से एक और सवाल पूछा: यह जीव, जो मन बनकर ख़ुद को "मैं मन हूँ" मान बैठता है, परमात्मा का क्या लगता है? वसिष्ठ ने पहले सिद्धांत समझाया, फिर कहा कि इसी विषय पर एक पुराना इतिहास सुनाया जाता है। एक राक्षसी का, जिसने प्रश्नों का पूरा जाल बुना था।

यह कथा उत्पत्ति प्रकरण के सर्ग ६८ से ८३ तक फैली है, और इसे वसिष्ठ राम को सुना रहे हैं। घटनाएँ और उनका क्रम मूल ग्रंथ का है; कहने का ढंग और जहाँ-तहाँ की टिप्पणियाँ मेरी हैं।

कथा एक नज़र में

ग्रंथ श्री योगवासिष्ठ महारामायण (योग वशिष्ठ), उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग ६८–८३
कौन सुना रहा है वसिष्ठ, राम को
मुख्य पात्र कर्कटी राक्षसी, किरात देश के राजा (टीका में नाम विक्रम) और उनके मंत्री; साथ में ब्रह्मा, इन्द्र, नारद और वायु
भूख हिमालय की विशाल राक्षसी की भूख कभी नहीं मिटी; सबको निगलने के लिए उसने तप करके जीवित सुई बनने का वर माँगा
मोड़ सुई बनकर एक बूँद खून से पेट भर गया, पर तृष्णा नहीं भरी; पछताकर उसने फिर तप किया और उसी तप में अपने विचार से आत्मज्ञान पा लिया
परिणाम देह वापस मिली; अँधेरी रात में राजा और मंत्री के उत्तर सुनकर भीतर शीतलता आई, और उसने किसी के प्राण न लेने का वचन दिया
मुख्य शिक्षा चाह पूरी होने से नहीं, भीतर की शीतलता से विश्राम मिलता है (उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग ८२, श्लोक २)

भूख जो कभी नहीं मिटी

हिमालय के उत्तरी छोर पर कर्कटी नाम की एक राक्षसी रहती थी। काजल के पहाड़ जैसी काली, इतनी बड़ी कि धरती और आकाश के बीच की आधी जगह भर दे। उसके दो नाम और थे: विषूचिका और अन्यायबाधिका। शरीर इतना बड़ा था, पर उसके लायक भोजन नहीं मिलता था, और पेट की आग समुद्र की वडवाग्नि जैसी कभी बुझती नहीं थी।

एक दिन उसने सोचा कि अगर जम्बूद्वीप के सारे प्राणियों को हर साँस के साथ निगलती जाऊँ, तो शायद यह भूख शांत हो। पर लोग मंत्र, औषधि, तप, दान और देवपूजा से सुरक्षित थे। तो उसने तय किया कि जो दुर्लभ है, वह उग्र तप से मिलेगा। ग्रंथ साफ़ कहता है कि यह तप सारे जीवों को मारने की इच्छा से शुरू हुआ था। वह हिमालय की निर्जन चोटी पर एक पैर पर खड़ी हो गई, और हज़ार वर्ष बाद ब्रह्मा वर देने आए। टीकाकार ख़ुद पूछते हैं कि ऐसी दुष्ट राक्षसी को ब्रह्मा का प्रसाद कैसे मिला, और उत्तर देते हैं कि दारुण तप सिद्धि देता ही है। तप नीयत नहीं देखता, लगन देखता है।

वर में माँगी सुई

ब्रह्मा सामने थे और कर्कटी को सूझा कि अगर मैं जीवित सुई बन जाऊँ, तो जैसे सुगंध साँस के साथ बिना दिखे भीतर पहुँच जाती है, वैसे ही सब प्राणियों के हृदय में एक साथ घुसकर धीरे-धीरे पूरे जगत को खा लूँगी। ब्रह्मा ने कहा, "पुत्री, उठो, मैं प्रसन्न हूँ, जो चाहो माँग लो," और उसने माँगा:

भगवन्भूतभव्येश स्यामहं जीवसूचिका ।
अनायसी चायसी च विधेऽर्पयसि चेद्वरम् ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ६९, श्लोक ८

अर्थ: हे भगवन्, भूत और भविष्य के स्वामी, हे विधाता! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं जीवित सुई बन जाऊँ, लोहे की भी और बिना लोहे की भी।

टीका "बिना लोहे वाली" सुई का अर्थ रोग बताती है: एक सुई जो आँख से दिखती है, और दूसरी जो रोग बनकर भीतर उतरती है। ब्रह्मा ने कहा, "ऐसा ही हो। तुम विषूचिका बनोगी, वह रोग जो प्राणवायु के रास्ते हृदय तक शूल उठाता है।" जिनका खान-पान और आचरण बिगड़ा है, उन्हें वह पकड़ेगी। साथ ही ब्रह्मा ने गुणी लोगों के इलाज का एक मंत्र भी बता दिया। वर और उसकी काट, दोनों एक ही साँस में।

पहाड़ से सुई तक

अब पहाड़ जैसी राक्षसी सिकुड़ने लगी। बादल जितनी, पेड़ की डाल जितनी, आदमी जितनी, हाथ भर, बित्ता भर, उँगली भर, उड़द के दाने जितनी, और आख़िर में रेशमी कपड़ा सीने वाली महीन सुई।

वसिष्ठ यहाँ उसकी मूर्खता पर हँसे बिना नहीं रहते। जिस भूख के लिए यह सब किया, सुई बनकर वही काम नहीं बना, क्योंकि सुई का पेट ही नहीं होता। यह बात उसने सोची ही नहीं। जो एक चीज़ पर अटक जाता है, उसे आगे-पीछे नहीं सूझता; राक्षसी ने अपना विशाल शरीर तिनके की तरह छोड़ दिया और उसे अपना नाश तक नहीं दिखा।

उसके दो रूप बने: लोहे की सुई, और साथ चलने वाली जीव-सूची, जो साँस के रास्ते लोगों के भीतर पहुँचकर कहीं रोग बनती, कहीं दुर्बुद्धि। लोहे वाली सुई कभी दर्ज़ी के हाथ में कपड़ा सीती, कभी कीचड़ में पड़ी रहती। बरसों वह इसी तरह भटकती रही।

एक बूँद खून

उसने तरह-तरह के मनुष्यों का मांस चखा, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। वसिष्ठ इसका कारण एक श्लोक में कह देते हैं:

पूर्वेणैव किलाह्ना सा तृप्ता रुधिरबिन्दुना ।
सूच्याः किमिव मात्यन्तस्तृष्णासूची सुदुर्भरा ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ७१, श्लोक २

अर्थ: पहले ही दिन खून की एक बूँद से उसका पेट भर गया था, आख़िर सुई के भीतर समाता ही कितना है। पर तृष्णा की सुई को भरना बहुत कठिन है।

पेट और तृष्णा का यह फ़र्क पूरी कथा की कुंजी है। सुई का पेट एक बूँद में भर गया था। जो नहीं भरा, वह भीतर की चाह थी।

फिर कर्कटी रोने लगी। "मेरे वे बादलों जैसे अंग कहाँ गए? कीचड़ में डूबती हूँ, पैरों तले कुचली जाती हूँ, मरना चाहती हूँ, वह भी नहीं होता। जैसे कोई मूर्ख काँच समझकर चिंतामणि फेंक दे, वैसे मैंने अपना शरीर फेंक दिया।" सर्ग के अंत में वह ख़ुद मान लेती है: "कहाँ मांस से भरा कौर, कहाँ पानी की एक बूँद का भोजन। अपने ही नाश का यह नाटक मैंने ख़ुद रचा है।"

मुझे यह आख़िरी वाक्य पूरी कथा में सबसे ईमानदार लगता है। कर्कटी को किसी ने ठगा नहीं था। उसने जो माँगा, ठीक वही मिला।

सुई का तप

रोते-रोते वह चुप हो गई और तय किया कि वही शरीर वापस पाने के लिए फिर तप करेगी। इस बार एक फ़र्क था: ग्रंथ कहता है कि उसने मन में बैठी लोगों को मारने की इच्छा समेट ली। नारद बाद में बताते हैं कि वह एक गीध के हृदय में घुसकर उसे उसी हिमालय की चोटी तक ले गई, और गीध सुई को वहाँ खड़ा करके लौट गया।

धूल भरी तपती ज़मीन पर सुई अपनी नोक पर ऊपर मुँह करके खड़ी हो गई। पेड़-लताओं ने उसके मुँह में पराग भर दिया, इन्द्र की भेजी हवा मांस का कण उड़ा लाई; उसने न मांस निगला, न पराग। कीचड़, बाढ़, आँधी, जंगल की आग, ओले, हज़ारों बरस, पर वह टस से मस नहीं हुई।

और यहीं वह हुआ जिसकी उसने माँग ही नहीं की थी। बाहर की हलचल से हटकर वह बहुत समय तक अपने ही सत्य, चेतन स्वरूप पर विचार करती रही। भीतर ज्ञान का प्रकाश उठा, और अपनी ही बुद्धि से उसने जानने योग्य को जान लिया। जो राक्षसी शरीर वापस पाने बैठी थी, वह आत्मज्ञानी हो गई।

उसके तप से लोक तपने लगे, तो इन्द्र ने नारद से पूछकर वायु को खोजने भेजा, और देवताओं के कहने पर ब्रह्मा फिर वर देने चले। यहाँ वसिष्ठ राम से सीधे कहते हैं: "राघव, अपनी चेतना पर ख़ुद विचार करके उसने परम कारण को जान लिया। अपनी समझ से किया गया आत्मविचार ही एकमात्र परम गुरु है, कोई दूसरा नहीं।"

अब वर किसलिए?

ब्रह्मा ने आकाश से कहा, "पुत्री, वर ले लो।" सुई के पास बोलने को इंद्रियाँ नहीं थीं। वह बस मन में सोचती रही: "मैं पूरी हूँ, मेरे संदेह मिट गए, अब वर लेकर क्या करूँगी? इतने दिन मैं अपने ही संकल्प से उपजे अविवेक में वैसे ही फँसी रही, जैसे कोई बच्ची अपनी कल्पना के बेताल से डरती है।" पहली बार वर माँगकर उसे दुःख मिला था। दूसरी बार उसे वर चाहिए ही नहीं था।

ब्रह्मा बोले, "फिर भी लो। कुछ समय धरती पर भोग भोगकर तुम परम पद पाओगी, यह नियति है। तुम्हें अपना वही शरीर फिर मिलेगा। तुम ज्ञानी हो, लोक को पीड़ा नहीं दोगी; भूख मिटाने के लिए न्याय से ही किसी को बाधा दोगी और अन्याय करने वालों को दंड दोगी।" उसका पुराना नाम अन्यायबाधिका यहाँ एक नए अर्थ में लौट आता है। पलक झपकते ही सुई बित्ते भर की हुई, फिर हाथ भर, फिर बादलों की घटा जितनी, और फिर से कर्कटी राक्षसी थी।

शरीर वही था, मन वही नहीं था। उसने राक्षस वाले भाव को साँप की केंचुली की तरह उतार फेंका और पद्मासन में ध्यान में बैठ गई। छह महीने बाद ध्यान टूटा तो भूख लगी, क्योंकि ग्रंथ कहता है कि जब तक देह है, देह का स्वभाव नहीं जाता। पर सवाल बदल गया था: "दूसरे जीव को अन्याय से नहीं खाना है। जो न्याय से न मिले, उस भोजन से तो मर जाना अच्छा। अब मेरे लिए न जीने में लाभ है, न मरने में हानि।"

तभी आकाश से वायु की आवाज़ आई: "कर्कटी, जाओ, अज्ञानियों को ज्ञान देकर जगाओ। जो तुम्हारे समझाने पर भी न जागे, वही तुम्हारा न्यायसंगत आहार होगा।" कर्कटी पहाड़ से उतरकर तलहटी में बसे किरात देश में पहुँच गई।

अँधेरी रात की परीक्षा

उस रात इतना घना अँधेरा था कि लगता था हाथ से पकड़ा जा सके। किरात देश का राजा, जिसका नाम टीका विक्रम बताती है, अपने मंत्री के साथ जंगल में रात की गश्त पर था। हाथ में धीरज के सिवा कोई हथियार नहीं।

कर्कटी का पहला विचार पुरानी कर्कटी वाला था: "भोजन मिल गया, ये दोनों मूढ़ हैं।" पर तुरंत दूसरा आया: "शायद ये गुणवान हों। भले मैं नष्ट हो जाऊँ, गुणी को नहीं खाऊँगी। पहले प्रश्न पूछकर देखती हूँ कि इनमें कितना ज्ञान है।" उसने बादल जैसी गर्जना की। राजा बिना डरे बोला, "अरे भूत, अपना शरीर दिखा। भौंरे की भनभनाहट जैसी तेरी आवाज़ से कौन डरता है। क्या चाहिए, बोल।" कर्कटी हँसी और अपना विकराल रूप दिखा दिया।

दोनों वैसे ही खड़े रहे। वसिष्ठ कहते हैं कि जिसका मन सत्य और मिथ्या का विवेक कर चुका, उसे मोह में डालने वाली कोई चीज़ नहीं। मंत्री शांति से बोला, "महाराक्षसी, इतना क्रोध किसलिए? तुम्हारे जैसे हज़ारों मच्छर हमारे धीरज की आँधी में उड़ चुके हैं। बोलो, क्या चाहती हो? हमारे पास से कोई माँगने वाला ख़ाली हाथ नहीं लौटा।" कर्कटी समझ गई कि ऐसी निडरता आत्मज्ञान के बिना नहीं आती। उसने शर्त रखी: "सब गुणों में अध्यात्म-ज्ञान सबसे ऊँचा है। जो इसे नहीं जानता, वह न राजा है, न मंत्री। मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, नहीं तो अपने स्वभाव के अनुसार मैं तुम्हें खा जाऊँगी।"

प्रश्न पहेलियों जैसे थे। किस एक अणु में लाखों ब्रह्मांड समुद्र के बुलबुलों की तरह लीन होते हैं? कौन चलते हुए भी नहीं चलता? कौन-सी आग जलाती नहीं? और इन्हीं के बीच:

कोऽणुस्तमःप्रकाशः स्यात्कोऽणुरस्ति च नास्ति च ।
कोऽणुर्दूरेऽप्यदूरे च कोऽणुरेव महागिरिः ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ७९, श्लोक ९

अर्थ: कौन-सा अणु अंधकार भी है और प्रकाश भी? कौन-सा अणु है भी और नहीं भी? कौन-सा अणु दूर होकर भी पास है? और कौन-सा अणु स्वयं एक महापर्वत है?

फिर धमकी: उत्तर न मिला तो तुम मेरी जठराग्नि का ईंधन बनोगे और उसके बाद तुम्हारा पूरा जनपद भी। इतना कहकर वह चुप हो गई, ग्रंथ के शब्दों में बाहर से विकराल, भीतर से शरद के बादल जैसी साफ़। आत्मज्ञान वह पहले ही पा चुकी थी, फिर भी इन्हें "अपना संशय" कहती है। मेरी समझ में ये प्रश्न परीक्षा भी थे और किसी जानकार के मुँह से वही बात सुनने की चाह भी।

अणु की पहेली का उत्तर

पहले मंत्री बोला, और पहली ही बात में सारी पहेलियों की गाँठ खोल दी: "तुमने इन सब प्रश्नों में परमात्मा का ही वर्णन किया है। जिसे तुम बार-बार अणु कह रही हो, वह यह है:"

अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः ।
चिन्मात्रमेवमात्माणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ८०, श्लोक ४

अर्थ: उसका कोई नाम नहीं, वह इंद्रियों की पहुँच में नहीं, और मन समेत छहों इंद्रियों के दायरे से परे है। इसलिए यह शुद्ध चैतन्य, यानी आत्मा ही वह "अणु" है, जो आकाश से भी सूक्ष्म है।

फिर मंत्री हर पहेली इसी कुंजी से खोलता गया। वह दूर है, क्योंकि इंद्रियों से नहीं मिलता; पास है, क्योंकि वह चैतन्य है। अंधकार है, क्योंकि उसे समझना कठिन है; प्रकाश है, क्योंकि वह शुद्ध चेतना है। जैसे बीज में पेड़, वैसे उसमें यह जगत।

कर्कटी ने मंत्री के वचनों को पवित्र कहा और राजा से बोलने को कहा। राजा बोला कि तुम उस सन्मात्र, शाश्वत ब्रह्म के बारे में पूछ रही हो, जो सारे संकल्पों के थमने पर पकड़ में आता है और फिर भी वाणी से परे है। उसने मंत्री की बात में एक बारीक सुधार भी किया: शुद्ध चेतना की तुलना परमाणु से करना वैसा ही है जैसे मेरु की तुलना सरसों से; उसे "अणु" कहना केवल कहने का ढंग है।

भीतर की ठंडक

राजा के मुँह से यह सुनकर कर्कटी ने अपनी जाति वाली ईर्ष्या और चंचलता छोड़ दी।

अन्तःशीतलतामेत्य विश्रान्तिमपतापताम् ।
प्राप्ता प्रावृण्मयूरीव सज्योत्स्नेव कुमुद्वती ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ८२, श्लोक २

अर्थ: भीतर से शीतल होकर उसने विश्राम पाया, उसका ताप मिट गया, जैसे वर्षा में मोरनी और चाँदनी में कुमुदिनी।

यह श्लोक मुझे इस कथा का केंद्र लगता है। ज्ञान कर्कटी को पहले ही मिल चुका था, अपने तप में, अपने विचार से। पर भीतर की यह ठंडक इसी रात आई, दो ऐसे लोगों के सामने जो वही बात जीकर बोल रहे थे। वह बोली, "जैसे फूल के संग से सुगंध आती है, वैसे सत्संग से कल्याण आता है। जिसके हाथ में दीपक हो, उसे अँधेरा कैसे हराए। कहिए, मैं आपकी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ?"

राजा ने बताया कि उसके देश में लोग हृदय के शूल से, विषूचिका से पीड़ित हैं, औषधियाँ काम नहीं कर रहीं, इसलिए वह रात में निकला था। "मेरी बस इतनी बात मान लो: अब किसी के प्राण मत लेना।" कर्कटी ने कहा:

बाढमेवं करोम्यद्यप्रभृत्यवितथं प्रभो ।
सत्यमेव न किंचिद्धि हिंसनीयं मयाधुना ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ८२, श्लोक १५

अर्थ: बहुत अच्छा, प्रभु! आज से मैं सचमुच ऐसा ही करूँगी। सच कहती हूँ, अब मुझे किसी की भी हिंसा नहीं करनी है।

कर्कटी ने कहा कि वह चोटी पर लौटकर ध्यान में बैठेगी और जब तक शरीर है, किसी के प्राण नहीं लेगी। उसी रात नदी के किनारे राजा और मंत्री आचमन करके शिष्य की तरह बैठे, और उसने उन्हें ब्रह्मा से मिला विषूचिका का मंत्र दिया, ताकि लोगों के हृदय के शूल शांत हों।

राजा ने उसे गुरु और सखी कहकर घर बुलाया। कर्कटी ने साफ़ कहा कि इस राक्षसी देह को साधारण भोजन तृप्त नहीं करेगा, यह स्वभाव देह रहते नहीं जाता। राजा का उत्तर आज के पाठक को चौंकाएगा, इसलिए वैसे ही लिख रहा हूँ जैसे ग्रंथ में है: वह उन चोरों और अपराधियों को इकट्ठा करेगा जिन्हें मृत्युदंड मिल चुका है, और कर्कटी उन्हें हिमालय ले जाए। राजा के शब्दों में, धर्म से दंडित इन लोगों का वध हिंसा नहीं गिना जाता। कर्कटी मान गई। छह दिन वह अंतःपुर में एक सुशील स्त्री की तरह रही। इस बीच राजा ने अपने राज्य और दूसरे नगरों से तीन हज़ार मृत्युदंड पाए लोग इकट्ठा करके उसे सौंप दिए। रात होते ही वह फिर वही विशाल काली राक्षसी बन गई और उन्हें लेकर हिमालय चली गई। वहाँ खाकर वह तीन दिन सोई और फिर समाधि में बैठ गई। उसके बाद हर चार-पाँच बरस में वह ध्यान से उठती, राजा के पास आती, कुछ समय बातें करती और उसके इकट्ठा किए दंडितों को लेकर लौट जाती।

वसिष्ठ कहते हैं कि वह आज भी उसी पहाड़ पर जीवन्मुक्त होकर रहती है, किरात देश के राजाओं की मित्र बनकर, उनके देश से उत्पात, भूत-प्रेत का भय और रोग दूर करती हुई। जब वह बहुत समय तक नहीं आई, तो लोगों ने नगर में "कंदरा" नाम की देवी के रूप में उसकी मूर्ति स्थापित कर दी। उसका दूसरा नाम मंगला भी है। जो राक्षसी पूरी दुनिया निगलना चाहती थी, उसकी कथा एक देवी की पूजा पर ख़त्म होती है।

मूल संदेश

कर्कटी को दो बार वर मिला। पहली बार उसने ठीक वही माँगा जो चाहती थी, और वह मिल भी गया। नतीजा यह कि एक बूँद से पेट भर गया और तृष्णा पहले से ज़्यादा भूखी हो गई। दूसरी बार उसे वर चाहिए ही नहीं था, क्योंकि तप के बीच उसने अपने को जान लिया था। शांति उस दूसरे क्षण में थी, पहले में नहीं।

कथा भूख और तृष्णा का फ़र्क भी साफ़ करती है। भूख शरीर की है और ज्ञान के बाद भी बनी रही। बदला यह कि भूख अब हुक्म नहीं चलाती थी। कर्कटी पूछने लगी कि न्याय से क्या मिला है, और जो तृष्णा पूरे जम्बूद्वीप को निगलना चाहती थी, उसकी जगह "किसी के प्राण नहीं लूँगी" का वचन आ गया।

और वसिष्ठ एक ओर आत्मविचार को परम गुरु कहते हैं, दूसरी ओर दिखाते हैं कि राजा के वचन सुनकर ही कर्कटी का ताप उतरा। समझ भीतर से आती है, शीतलता अक्सर संगति में पूरी होती है।

भूख से शीतलता तक — सबको निगलने का तप, सुई बनने का वर, एक बूँद से भरा पेट पर न भरी तृष्णा, दूसरा तप और आत्मज्ञान, सत्संग में भीतर की शीतलता और अहिंसा का वचन

जीवन में उपयोग

हम राक्षस नहीं हैं, पर कर्कटी वाली ग़लती छोटे पैमाने पर रोज़ करते हैं। कोई एक चाह इतनी बड़ी हो जाती है कि उसे पाने के लिए हम ख़ुद को छोटा करते जाते हैं: समय, सेहत, रिश्ते, सब काट-छाँटकर। और जब वह मिलती है, तो पेट भर जाता है, मन नहीं।

ऐसे में पहले यह देखिए कि इस चाह के लिए आप ख़ुद को कितना सिकोड़ रहे हैं। फिर पिछली बार याद कीजिए जब ऐसी ही कोई चाह पूरी हुई थी, और ईमानदारी से देखिए कि तृप्ति कितने दिन टिकी। अगर एक बूँद से पेट भरा और प्यास वैसी ही रही, तो कमी उस चीज़ में नहीं, तृष्णा में है।

फिर ज़रूरत और तृष्णा को अलग कीजिए। ज़रूरत असली है, उसे पूरा कीजिए, पर कर्कटी की तरह यह पूछकर कि जो मिल रहा है वह न्याय से मिल रहा है या किसी को चुभाकर। तृष्णा के साथ उलटा कीजिए: पूरा करने की जल्दी छोड़कर रुकिए और देखिए कि यह चाह असल में किसकी है। और जब कोई ऐसा व्यक्ति मिले जिसके पास बैठकर मन ठंडा हो, तो उस संगति को हल्के में मत लीजिए। कर्कटी ज्ञानी होकर भी उस रात कुछ लेकर लौटी थी।

जब लगे कि बस यह मिल जाए — चाह की क़ीमत देखें, पिछली पूरी हुई चाह याद करें, ज़रूरत हो तो न्याय से पूरी करें, तृष्णा हो तो रुककर विचार करें

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
विषूचिका प्राणवायु के रास्ते हृदय तक पहुँचकर शूल उठाने वाला रोग; कर्कटी का सुई वाला रूप A disease causing piercing pain up to the heart; Karkati's needle form
तृष्णा वह चाह जो पाने से भी नहीं भरती Craving that is not filled by getting
अणु (चिदणु) कर्कटी की पहेलियों का "सूक्ष्म कण", यानी शुद्ध चैतन्य, आत्मा The "subtle atom" of Karkati's riddles: pure consciousness, the Self
तप किसी लक्ष्य के लिए कठोर, अडिग साधना Austerity; steadfast, rigorous effort toward a goal
आत्मविचार अपने सत्य स्वरूप पर किया गया विचार, जिसे वसिष्ठ परम गुरु कहते हैं Self-inquiry, which Vasishtha calls the supreme teacher
अन्तःशीतलता भीतर की ठंडक; ताप मिटने पर मिलने वाला विश्राम Inner coolness; the rest that comes when the burning ends
सत्संग ज्ञानी और सज्जन लोगों की संगति The company of the wise and good
जीवन्मुक्त जो शरीर रहते ही मुक्त है One liberated while still living

Sources