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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 43

29 verse-groups

  1. Verse 1श्रीसरस्वतीजी ने कहा : हे पूर्वजन्म के मण्डलपति, आइये ओर लीला की भक्ति ओर भाग्य के अनुरूप…
  2. Verse 2राजन्‌ अविवाहित राजकुमारी को और मन्त्री को पूर्वजन्म का नगर प्राप्त होगा और आपको शवरूप वह…
  3. Verse 3राजन्‌, हम लोग जैसे आये थे, वैसे ही जाती हैं, लेकिन आप, राजकुमारी और मन्त्री मरकर वायुरूप…
  4. Verse 4अश्व आदि की गति के समान देशदैर्ध्य की अपेक्षा नहीं होती, इस आशय से देवीजी कहती हैं। यह आत…
  5. Verses 5–7मघुर भाषण करनेवाले श्रीसरस्वती देवीजी और राजा में परस्पर यह वार्तालाप हो ही रहा था कि एक…
  6. Verses 8–9पर्वताकार नगर में आग लगी है उसने अपनी ज्वालाओं से चारों दिशाओं को व्याप्त कर रक्खा है । व…
  7. Verses 10–13श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वह पुरुष राजा से यह सब कह ही रहा था कि बाहर द…
  8. Verse 14तदुपरान्त दोनों देवियों ने यानी सरस्वती देवी तथा लीला ने, मन्त्री ओर राजा विदूरथ ने अपने…
  9. Verses 15–16वह नगर प्रलयकाल में अत्यन्त विक्षुब्ध पूर्ण समुद्र के सदश वेगवाले भीषण हथियाररूपी मेघतरंग…
  10. Verses 17–19उक्त नगर लूटने के समय दूसरों को डराने के लिए महामेघो की गर्जना के सदृश अपनी डाँटफटकार से…
  11. Verses 20–27उस नगर मेँ मरे हुए सैनिकों में से बचे हुए कुछ सैनिकों का नगर प्रवेश हो रहा था, जिनमें अगा…
  12. Verse 28तदुपरान्त राजा विदूरथ ने वहाँ पर योद्धाओं की तथा उन लोगों का, जिनका देखते देखते स्त्री, प…
  13. Verse 29उनमें से किसीने किसीको सम्बोधन कर कहा : खेद है, अधिक रस होने से (जलाधिक्य से) हरे-भरे अतए…
  14. Verse 30हाय, पहले तुषार की ठण्ड से ठिठुरी हुई, बाद में आग की झपटों से झुलसी हुई स्त्रियाँ हाथियों…
  15. Verse 31हाय हाय, युवतियों के केश बन्धन रूपी तिनकों में लगी हुई और वीररूपी वायु द्वारा फेंकी गई शस…
  16. Verse 32देखो, आवर्तो से और नदी के प्रवाहभेदों से विशाल, ऊपर को बहनेवाली धुम्ररूपी यमुना आकाशगंगा…
  17. Verse 33देखो, यह ऊपर को जानेवाली धुम्रनदी, जिसमें अधजले काठ जल रहे हैं और चिनगारियाँ ही बुद्बुदों…
  18. Verse 34हे पुत्री, इस बेचारी के माता, पिता, भाई, जमाई और दूध पीने वाले बच्चे इस घर में जल गये हैं…
  19. Verse 35जल्दी निकलो, तुम्हारा अगार की नाई जला हुआ यह घर, प्रलयकाल में सुमेरु की नाई अपने स्थान से…
  20. Verse 36अहा, बाण, पत्थर, शक्ति, भाले, प्रास, तलवार, आदि शस्त्रासत्र झरोखों के जालरूपी सन्ध्याकाली…
  21. Verses 37–38जैसे समुद्र से जलप्रवाह खूब धधकती हुई ज्वालाओं से युक्त बड़वानल में प्रवेश करते हैं, वैसे…
  22. Verse 39अग्नि की ज्वालाएँ ऊँचे-ऊँचे महलों के शिखरों में स्थित बड़े-बड़े मेघों को धुआँ-सा बना रही…
  23. Verses 40–42घरों के आस-पास के वृक्षों के फूल, फल और लता आदि जल गये हैं, उनमें शोभा नाममात्र को भी नही…
  24. Verse 43हाय हाय, बड़ा कष्ट है किसी पुरुषके तलवार से कटे हुए, कड़े उल्मुक(अधजले काठ) से युक्त कन्ध…
  25. Verse 44हाय हाय, व्याकुल हुए भीषण गाय, घोड़े भैंस, हाथी, ऊट, कुत्ते, सियार और भेडो ने मार्ग को रो…
  26. Verse 45आग की ज्वालाओं से झुलस जाने के भय से गीले वस्त्र पहनकर घरों से निकल रही स्त्रियों का वर्ण…
  27. Verses 46–47देखो, अशोक के फूलों की कान्ति को धारण कर रही ज्वाला ओं की लपटें स्त्रियोंक अलकों को ऐसे च…
  28. Verse 48स्वयं जल रहा भी पुरुष अपने स्त्री-पुत्र आदिके बिना घर से नहीं निकलता । ओहो बड़ा खेद है कि…
  29. Verses 49–61युक्त है, अधजला केशभार इनके वक्षस्थल ओर स्तनमण्डल पर बिखरा है । वायु के कारण फरफरा रहे वस…