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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 86

पचासीवाँ सर्ग समाप्त छियासीवोाँ सर्ग ब्रह्माण्डरूपी खोपड़ी को ग्रस लेनेवाले रुद्रशरीर का सूक्ष्मभाव से शिलारूप चिदाकाश में तिरोभाव तथा उस प्रदेश से भिन्न अन्य प्रदेशों के अन्य शिला, वृक्ष आदि सकलरूप ब्रह्म में सृष्टि की विचित्रता का दर्शन।

58 verse-groups

  1. Verse 1सबसे पहले रुद्रदेह के उयसहार क्रम को छुनाते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, उस महा…
  2. Verse 2समय चित्रलिखित के सदृश निश्चल यानी चेष्टा शून्य थे, यही पहले मेने देखा था
  3. Verse 3तदनन्तर एक मुहूर्तमात्र मे अन्य आकाश में उस रुद्रने उक्त खण्ड (ब्रह्माण्ड के ऊपर-नीचे के…
  4. Verse 4तदनन्तर एक निमेषमात्र में उस रुद्रने अपने मुख से खीचे गये श्वासवायु से उन दोनों खोपड़ियों…
  5. Verse 5उस समय वह रुद्र भगवान्‌, जिसने कि ब्रह्माण्ड खण्डरूपी उग्र दुग्धसार और पकवान के मण्डल को…
  6. Verse 6उसके बाद एक मुहूर्तमात्र मे मेच के सदृश वह हलके हो गये, इसके अनन्तर यष्टि के सदृश, इसके ब…
  7. Verse 7उसके बाद ऐसे रुद्र की काँच के छोटे टुकड़े के सदृश आकृति हो गई, यह मैंने देखा | फिर दिव्यद…
  8. Verse 8भद्र, तदनन्तर परमाणुरूप हो गये, फिर एकदम तिरोहित (अदृश्य) हो गये । इस प्रकार उस तरह जगत्‌…
  9. Verse 9भद्र, भगवान्‌ शंकरजी ने आवरणयुक्त ब्रह्माण्ड रूपी कपाट उस प्रकार निगल लिया, जिस प्रकार कि…
  10. Verse 10तदनन्तर वह दृश्यरूप कालिमा से रहित चिदाकाशरूप शान्त केवल ब्रह्मरूप ही रह गया । वह आदि, मध…
  11. Verse 11अब पाषाणोदर-कथाकी समाप्ति दशति हुए उफसलार करते हैं / भद्र, इस प्रकार उस शिला के टुकड़े के…
  12. Verse 12हे राघव, तदनन्तर उस अंगना का उस शिला का एवं उस संसारभ्रम का स्मरण कर मैं ऐसे ही विस्मय को…
  13. Verse 13पुनः उस सुवर्ण की शिला को भने पूर्व प्रदेश से अन्य प्रदेशों में भी देखा उसके अशेष अंगों म…
  14. Verse 14भद्र, बुद्धिरूपी नेत्र से वे सृष्टियाँ उन शिलाखण्डों में दीख पड़ती हैं, और अद्वैतदृष्टि स…
  15. Verse 15यदि मांसमय दृष्टि से दूरपर स्थित वस्तु के सदृश आपाततः देखी जाय, तो वह केवल अकेली शिला ही…
  16. Verse 16घनमण्डलवाली वह सुवर्णमयी शिला एकरूप ही स्थित थी। सन्ध्याकाल के मेघ के सदुश अतिसुन्दर एवं…
  17. Verse 17श्रीराघव, इसके बाद अत्यन्त आश्चर्य से युक्त होकर मैंने फिर उस शिला के दूसरे भाग के विषय म…
  18. Verse 18विचारकर ज्यों ही मैंने उसे देखा, त्यों ही वह दूसरा भाग भी अनेक तरह के जगत्‌ के आरम्भों से…
  19. Verse 19इसी तरह फिर मैंने उसके अन्य प्रदेश को भी देखा, तो वह भी उसी प्रकार से अनेक तरह की सृष्टिय…
  20. Verse 20भद्र, उस शिला के जिस-जिस प्रदेश को मैं देखता, उस-उस प्रदेश में निर्मल दर्पण में प्रतिबिम्…
  21. Verses 21–22इसके बाद मैंने बडे ही कौतुक से उस पर्वत की सभी शिलाएँ, भूमिभाग एवं तृण, गुल्म आदि के ऊपर…
  22. Verse 23उस उस प्रदेश में जो जो विशेष विशेष देखा, अब उसे दशति हैं । कहीं पर प्रारम्भिक सृष्टि के ल…
  23. Verse 24कहीं पर पृथ्वी की पीठ मनुष्यों के समूहों से भरी थी, तो कहीं पर राजा सगर के पुत्रों ने चार…
  24. Verse 25कहीं पर कोई जगत्‌ तो देवताओं की उत्पत्ति से शून्य और दानवों की उत्पत्ति से युक्त देखने मे…
  25. Verse 26भद्र, कहीं पर कुछ जगत्‌ कलियुग के आचरणों से युक्त तथा दुर्जन प्राणियों से भरे थे, तो कहीं…
  26. Verse 27कहीं पर जगत्‌ बड़े-बड़े पर्वतों के समूहों से इतना व्याप्त था कि उसमें तनिक भी अवकाश नहीं…
  27. Verse 28कहीं पर कुछ जगत्‌ ऐसे देखे कि उनमें पृथ्वी के सभी मानव जरामरण से रहित थे और कहींपर भगवान्…
  28. Verse 29भद्र, कहीं पर तो क्षीरसागर का मंथन ही नहीं हुआ था, इसलिए वह मृत्युग्रस्त देवताओं से पूर्ण…
  29. Verse 30कहीं पर शुक्राचार्य की मृतसंजीविनी महाविद्या पैदा करनेवाली महती तपश्चर्या में विघ्न डालने…
  30. Verse 31कहीं पर जगत्‌ में धर्म में ग्लानि न आने के कारण समस्त जनता स्वप्रकाश ब्रह्मज्ञान से पूर्ण…
  31. Verse 32कहीं पर जगत्‌ अपूर्व वेद एवं शास्त्र के अर्थो के अनुसार आचरण तथा विचार में तत्पर दिखाई दि…
  32. Verse 33कहीं पर तो जगत्‌ में दैत्यों के समूहों से देवताओं के घर लुटे हुए मिले, और कहीं किसी जगत्‌…
  33. Verse 34कहीं किसी जगत्‌ में देवता ओर दानवाँ मे समुद्रमंथन के लिए बना हुआ उत्तम सौहार्द (मेल) देखन…
  34. Verse 35भद्र, इस प्रकार भूत, वर्तमान एवं भविष्य काल के महान्‌ जगदाडम्बर को मेने उस समय विश्वरूप म…
  35. Verse 36उसी जग्रत्‌ के आडम्वर्यो को फिर दशति हैं / कहीं पर जगत्‌ कल्पकाल के कुपित पुष्करावर्त मेघ…
  36. Verse 37कहीं पर कुपित देवता, दावन एवं राजाओं से व्याप्त था, कहींपर सूर्य की उत्पत्ति ही न होने के…
  37. Verse 38कोई सूर्योदय के कारण अन्धकार से रहित अतएव ज्वालोदर के समान सुन्दर प्रतीत हो रहा था, और कह…
  38. Verse 39किसी जगत्‌ में नवीन ब्रह्माजी कमल की पिटारी में बालकरूपमें सोये पड़े थे, किसी जगत्‌ में त…
  39. Verse 40किसी जगत्‌ में प्रलयरूपी महारात्रि का अतिशून्यरूप यानी प्रकाशरहित गाढ अंधेरा छाया हुआ था,…
  40. Verse 41कोई तो सोया हुआ ओर जठर के सदृश मालूम पड़ रहा था, कोई अतर्कि त (विलक्षण) तथा ज्ञानयोग्य ही…
  41. Verse 42किसी जगत्‌ में पंखों से अत्यन्त क्षुब्ध पर्वतरूपी कौओं से सारा आकाशमण्डल आच्छन्न था ओर कि…
  42. Verse 43किसीमें तो तरंगमालाओं से आकुल प्रमत्त समुद्र पृथ्वी ओर पर्वतो को ले जाते हुए दीख पड़े और…
  43. Verse 44कहीं पर मत्त पातालगजों से वसुन्धरा कम्पित हो रही थी ओर कहीं शेष के मस्तक से कल्पान्त में…
  44. Verse 45किसी स्थान में छोटे बालकरूप रामजी राक्षस रावण को नष्ट कर रहे थे, तो किसी में राक्षस रावण…
  45. Verse 46कहीं पर कालनेमि राक्षस ने भूमि पर धरे अपने पैर से तथा सुमेरु पर्वत के मस्तक पर रक्खे अपने…
  46. Verse 47कहीं पर सारा जगत्‌ देवों को हटाकर दानवो द्वारा पालित था ओर कहींपर दानवो को हटाकर देवों द्…
  47. Verse 48कहीं पर जगत्‌ में अर्जुनयुक्त स्वजनपालक कृष्ण से पाण्डव तथा कौरवों के द्वारा महाभारत-युद्…
  48. Verse 49कहीं छोटे बालक रामजी के द्वारा रावण मारा जा रहा था“ यह चुनकर आशचर्यवकित हुए श्रीरामजी प्र…
  49. Verse 50श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, सभी पदार्थ बारबार दूसरे या उसी क्रम से अवयवसंनिवेश…
  50. Verse 51भद्र, कोई पदार्थ, जिनके सब क्रम समान हैं, शब्दों के अर्थो के तुल्य उसी आकृति से स्फुरित ह…
  51. Verse 52राघव, फिर-फिर तुम, फिर-फिर हम और ये मनुष्य भी फिर-फिर उत्पन्न होते ही रहते हैं । वास्तव म…
  52. Verse 53मायादृष्टि से ही वे उत्पन्न होते हैं या अन्य उत्पन्न होते हैं; इस विषय का तो निर्णय है ही…
  53. Verse 54भद्र, इस संसार में उत्पन्न हो रहे अनेकविध भ्रमों के कारण भूतसमुदाय आते और जाते रहते हैं ।…
  54. Verse 55चारों ओर भूत उसी रूप से घूमते हैं और अन्य रूप से भी घूमते हैं, अन्य क्या कहें ये भूत जगत्…
  55. Verse 56इस्त विषय का पूर्व मुमुश्च-व्यवहारप्रकरणा में जो कथन किया गया था, उम्रका स्मरण कराते हुए…
  56. Verse 57कोई जीव पूर्व के उन धन आदि से आधे समान होकर आते हैं और कोई चतुर्थाश से समान होकर आते हैं,…
  57. Verse 58ऐसे ही जीवों का भेद होने पर शरीर भिन्न हों; यह भी नियम नहीं है, इस आशय से कहते हैं / किसी…
  58. Verse 59धर्माधर्म चेष्टा के कारण कालवश विचित्र अनेक देह धारण से दूसरे दूसरे रूपवाले बनकर नीचे एवं…