Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
पूर्यमाणा यथा माषाः क्रमेणान्येन तेन वा ।
सर्वक्रमसमाः केचित्तयैवान्येन वा मिथः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, कोई पदार्थ,
जिनके सब क्रम समान हैं, शब्दों के अर्थो के तुल्य उसी आकृति से स्फुरित होते हैं या कोई समुद्र
की तरंगों के सदृश उसी अथवा परस्पर भिन्न आकृति से स्फुरित होते हैं