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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

जगत्पश्यामि विमलमादर्श इव बिम्बितम् । मयातिकौतुकेनाथ सर्वास्तस्य गिरेः शिलाः ॥ २१ ॥ अन्विष्टा भूतिभागाश्च तृणगुल्मादयस्तथा । यावत्सर्वत्र तत्तादृग्जगदस्ति यथास्थितम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके बाद मैंने बडे ही कौतुक से उस पर्वत की सभी शिलाएँ, भूमिभाग एवं तृण, गुल्म आदि के ऊपर जहाँ कहीं भी दृष्टिपात किया, वहाँ सर्वत्र उसी प्रकार अनेक तरह के आकारो से युक्त जगत्‌ को विद्यमान देखा। भद्र, यह बुद्धि से (आधिभौतिक देहभाव की भ्रान्ति से शून्य सर्वसाक्षी मैं ही हूँ, इस बुद्धि से) ही देखा जाता है, चर्मचक्षु से नहीं