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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

अभवं चेदनेनैव संनिवेशेन तत्कथम् । श्रीवसिष्ठ उवाच । सर्व एव विवर्तन्ते राम भावाः पुनःपुनः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, सभी पदार्थ बारबार दूसरे या उसी क्रम से अवयवसंनिवेश (आकृति) धारण करते हैं, जैसे कि बार-बार घड़े आदि में भरे जा रहे उड़द उसी या अन्य क्रम से अवयवसंनिवेश (आकृति) धारण करते हैं