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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 84

तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवों सर्ग शिव ओर शक्ति के स्वरूप का विभागपूर्वक वर्णन तथा सूप आदि की माला के स्वरूप का भी सत्यासत्यविचारपूर्वक वर्णन।

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  1. Verse 1श्रीरामभद्र ने कहा : हे मुने, आपने जो यह वर्णन किया कि भगवती काली नृत्य करती थी, अब आप उस…
  2. Verse 2शिवजी के स्वरूप निरूपण किये बिना शक्ति के स्वरूपका निरूपण नहीं हो सकता, उसनलिष्र दोनों का…
  3. Verse 3दो द्ष्टान्तोः से माया में अनन्यत्वका समर्थन करते हैं / भद्र, जैसे पवन और स्पन्दन दोनों ए…
  4. Verse 4यतो वा इमानि श्रुतानि“ इत्यादि श्रुतियों में जयत्वृष्टि, प्राणस्यन्दन आदि करियासे ही शिवा…
  5. Verse 5स्पन्दनरूप मायाशक्ति से ही वह शिवजी लक्षित होते हैं, अन्यथा नहीं । शिवजी ही ब्रह्मरूप हे,…
  6. Verse 6सोऽकामयत बहु स्या प्रजायेय” इत्यादि से वह स्यन्दशक्ति ही शिवजी की इच्छा है, वह इच्छा इस द…
  7. Verse 7भद्र, इससे सिद्ध हुआ कि शिव की उक्त इच्छा ही कार्य करने में दक्ष है, अतः समस्त आकार से रह…
  8. Verse 8वही जगत्‌ के आकार में परिणत होती है, अतः समस्त सृष्टि की प्रकृति भी वही है, दृश्यों में (…
  9. Verse 9्रीपिचर्मपरीधाना शुष्कमासातिभैरवा ˆ (व्याप्रचर्म धारण की हुई. शुष्कमांसा एवं अतिभयकर देवी…
  10. Verse 10जब वह एकमात्र जयनिष्ठ हो जाती है, तब जया, सिद्धों की शरण होने से सिद्धा, जया होने से जयन्…
  11. Verse 11महाशक्ति के कारण अपराजिता, उसका स्वरूप दुर्निग्रह होने के कारण दुर्गा, तथा ॐकार की सारभूत…
  12. Verse 12जप करनेवालों के लिए परमपुरुषार्थरूप होने के कारण गायत्री, प्रसवकी भूमि होने से सावित्री त…
  13. Verses 13–14चूँकि माया का स्वरूप अति गौर है, अतः वही गौरी है, वही शिवजी के शरीर की चिरसंगिनी है । सुप…
  14. Verse 15शिव ओर भगवती शिवा दोनों तो वेतनरूप हैं; इसलिए वे जड़ आकाश रूप कैसे हो सकते हैं? इस आशंका…
  15. Verses 16–19उनकी असूर्तता और स्वच्छता भी आकाश के ही सद्रथ समञ्मनी चाहिए, यह कहते हैं । शिवजी और शिवा…
  16. Verse 20अतः यह देवी क्रियारूपा है, इसलिए उसका अवयव मानना चाहिए, क्योकि निरवयव वस्तु से कोई क्रिया…
  17. Verse 21काली शब्द की व्याख्या में भी उसकी एकमात्र क्रियास्वभावता तथा ब्रह्माण्ड शरीर होने से समस्…
  18. Verse 22यों जयत्‌-रूप अगो को धारण करने पर भी उसकी अगठदासीन चिद्रप शिवकस्वभावता होने के कारण वास्त…
  19. Verse 23अग्रो के न रहते भी व्यपदेश होने में दृष्टान्त देते हैं / भद्र, जैसे आकाश का शून्यत्व है,…
  20. Verse 24उस प्रकार उसका कालात्मक, जयतअंगवाला कियास्वरूपका वर्णन कर अब उसका वास्तविक स्वरुप बतलाते…
  21. Verse 25उसका जैसे क्रियात्सक स्वरुप हैं, वह तो अबोधकाल में दिखाई पड़ता हे ओर शिवात्मक स्वरूप बोधद…
  22. Verse 26कूटस्थ चितिशक्तिरूप देवी की अपने स्वरूप में जो अविद्या से प्रतिकूल स्पन्दन, जड़ आदि स्वभा…
  23. Verse 27भद्र, चितिशक्ति की स्वरूपभूत, विशाल आकृतिवाली इस क्रियारूपा देवी के, जिसने कि कल्पितस्वरू…
  24. Verses 28–32ये सब उसके अनन्य अवयव हैं-विद्यमान जनतावर्ग से युक्त सृष्टियाँ आलोक से भास्वर लोक, द्वीप…
  25. Verse 33ङस प्रकार आपने दो प्रश्नो का यद्यापि समाधान तो किया, तथापि पूर्व सर्ग में उक्त इस शक्रा क…
  26. Verse 34जयत ओर प्रलय की कभी थी न तो आत्यन्तिक सत्ता है ओर न आत्यन्तिक असत्ता है / किन्तु सत्य सकल…
  27. Verse 35क्यो स्रत्य-स्रा भास़ा 2 इस पर कहते हैं / भद्र, बाह्य मुख आदि बिम्ब को लेकर जैसे दर्पण मे…
  28. Verse 36असत्य कयो ह 2 इस पर कहते हैं / उक्त अनुभव के बल से पदार्थों की सत्यता होनेपर भी चेतनरूप क…
  29. Verse 37अज्ञानियें की ष्टि से जगद्‌ में प्रतीत्यात्मक सत्यता जो है, उसे स्वप्न आदि के पदार्थों मे…
  30. Verses 38–39हे राघव, यदि आप यह कहें कि दर्पण के भीतर विद्यमान घट आदि मेरे लिए बाहर जलाहरण आदि करने मे…
  31. Verse 40इसलिए तत्‌-तत्‌ अर्थक्रिया को देखनेवाले द्रष्टा की द्वष्टि से ही वह सत्य ठहरता हैं, दूसरे…
  32. Verse 41इसी प्रकार प्रकृत में भी योजना करनी चाहिए, यों उफसहार करते हैं / श्रीरामभद्र, इसलिए चितिश…
  33. Verse 42भूत, वर्तमान, एवं भविष्य के जितने भी संकल्प, स्वप्न आदि के नगर आदि हैं वे सब सत्य ही हैं,…
  34. Verse 43इस्रीलिए दूसरे के स्वप्नो में अनुभूत होनेवाले पदार्थों का योगी लाभ करते हैं ओर भोग भी करत…
  35. Verses 44–45नृत्य से भगवती कालरात्रि के वलित होने पर भी उसकी देह में स्थित भरमि आदि का चलन न होने में…
  36. Verse 46श्रीरामभद्र, यों त्रैलोक्य का महान्‌ आरम्भ सत्य होते हुए भी केवल भ्रान्तिभात्र ही है । जो…
  37. Verse 47कब स्वप्ननगर सत्य रहा, कब स्वप्ननगर असत्य रहा, कब स्वप्ननगर नष्ट हुआ और कब वह स्थित रहा ?
  38. Verse 48भद्र, भगवती काली के अंगों में स्थित वह समस्त दुश्यश्री केवल भ्रान्तरूपा ही थी, अतः आप इस…
  39. Verse 49हे राघव, संकल्प, मनोराज्य, स्वप्न, कथा एवं भ्रमदशा में जैसे नगरों का अनुभव भ्रान्तिमात्र…
  40. Verse 50भद्र, चितिरूप आत्मा के अन्दर यह “अहम्‌” (मैं) और जगत्‌ नाम की कोई वास्तविक वस्तु है ही नह…