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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

यद्यथाभूतसर्वार्थक्रियाकारि प्रदृश्यते । तत्सत्यमात्मनोऽन्यस्य नैवातत्तामुपेयुषः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए तत्‌-तत्‌ अर्थक्रिया को देखनेवाले द्रष्टा की द्वष्टि से ही वह सत्य ठहरता हैं, दूसरे की द्रष्टि से नही यों प्रतिनिम्बादि की सत्यता व्यवस्थित हो जाती है, यों कहते हैं / भद्र, जो पदार्थ यथार्थ में सकल अर्थक्रियाकारी दिखाई देता है, उसे देखनेवाले द्रष्टा के प्रति वह सत्य है और उसे न देखनेवाले अन्य के प्रति वह असत्य है