Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

चालितस्य यथा गाढनिद्रस्य स्वप्नपत्तनम् । न लुठत्येव लुठितमित्यप्यनुमतं स्फुटम् ॥ ४४ ॥ तथा चलन्त्या लुठितं तस्या देहगतं जगत् । न लुठत्येव मुकुरप्रतिबिम्बमिव स्थितम् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

नृत्य से भगवती कालरात्रि के वलित होने पर भी उसकी देह में स्थित भरमि आदि का चलन न होने में दृष्टान्त कहते हैं / यदि पलंग धीरे से अन्य स्थान में हटाया जाय, तो उसपर गाढ़ निद्रा में सोया हुआ पुरुष शयन स्थान से अन्यत्र ले जाया गया, परन्तु उसका स्वप्ननगर तो लुढ़का ही नहीं और शरीर तो लुढ़का हुआ ही माना जा सकता है । बस इसी प्रकार नृत्य कर रही कालरात्रि का शरीर चलित हुआ, परन्तु शरीरगत जगत्‌ चलित हुआ ही नहीं, यह भी हो सकता है । दर्पण में प्रतिबिम्ब के सदुश उसके शरीर में जगत स्थित रहता है