Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रामासौ किल चिच्छक्तिस्तया यच्चोदितं तथा ।
तत्प्रचेतितमेवातः सत्यं चेदमिवाखिलम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जयत ओर प्रलय की कभी थी न तो आत्यन्तिक सत्ता है ओर न आत्यन्तिक असत्ता है /
किन्तु सत्य सकल्य का अनुसरण करनेवाली विति ने जिसे सत्यस्वरूप से प्रकाशित किया वह
सत्य है, जिसे असत् स्वरूप से प्रकाशित किया वह असत्य ह / इग्नलिए किसी भी पदार्थ का
स्वतः कड रुप नहीं कहा जा सकता / इस बात से यह निष्कर्ष निकला कि प्रलयकाल में
भी ऐन्दव सर्य स्थित थे और वे अथक्रियासमर्थ भरी थे, क्योंकि चिति का वैसा संकल्प था तथा
नहीं भी था, क्योकि चिति का अन्य संकल्य श्री था / इसका पूर्व में वर्णन भी करिया गया है-
यों संकल्पभेद द्रष्टि से वश्तिष्ठजी उत्तर देते हैं।
श्रीरामजी, वास्तव में तो सब कुछ चितिशक्ति ही है, इसलिए तत्-तत् भोक्ता प्राणियों
के भेद द्वारा सृष्टिनिमित्त या प्रलयनिमित्त जिसका जिस वस्तु के रूपमे सत्यसंकल्प चिति ने
संकल्प किया, उसका उसी के रूप में उन भोक्ताओं ने भी अनुभव किया । अतः उन
अनुभवकर्ताओं की दृष्टि से यह समस्त जगत् सत्य-सा है ओर अन्यं की दृष्टि से अत्यन्त
अप्रसिद्धि के कारण असत्य-सा भी हे