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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

न मनागपि तत्रास्ति स्तैमित्यं स्पन्दधर्मता । सा क्रियैव तथारूपा सती बोधवशाद्यदा ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसका जैसे क्रियात्सक स्वरुप हैं, वह तो अबोधकाल में दिखाई पड़ता हे ओर शिवात्मक स्वरूप बोधदशा में प्रत्यक्ष होता है, यही असली है, यह कहते हैं / अज्ञानदशा में वह उक्तस्वरूपा क्रिया ही है, पर जब बोधवश यानी ज्ञानवश क्रियास्वभाव से मुक्त होकर वास्तव रूपधारिणी हो जाती है, तब उसकी शिव संज्ञा पड़ जाती है-उसे शिव ही कहा जाता है