Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स्पन्देन लक्ष्यते वायुर्वह्निरौष्ण्येन लक्ष्यते ।
चिन्मात्रममलं शान्तं शिव इत्यभिधीयते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यतो वा इमानि श्रुतानि“ इत्यादि श्रुतियों में जयत्वृष्टि, प्राणस्यन्दन आदि करियासे ही शिवात्मक
ब्रह्म का लक्षण करने के कारण भी माया एवं शिव दोनों अनन्य हैं; यह कहते हैं ।
जैसे स्पन्दन से वायु ही कहा जाता है या जैसे उष्णता से अग्नि ही कही जाती है, वैसे
ही शिव से भी निर्मल शान्त चैतन्यमात्र ही कहा जाता है