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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verses 16–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 16-19

संस्कृत श्लोक

नभोनिभावभूताङ्गावच्छौ व्योम्न इवाग्रजौ । हस्तपादास्यमूर्ध्नो यद्वहुत्वाल्पत्वभेदतः ॥ १६ ॥ नानात्वं हलशूर्पादिस्रग्धरत्वं च तच्छृणु । सा हि क्रिया भगवती परिस्पन्दैकरूपिणी ॥ १७ ॥ दद्यात्स्नायाच्च जुहुयादित्याद्यग्रशरीरिणी । चितिशक्तिरनाद्यन्ता तथा भातात्मनात्मनि ॥ १८ ॥ साकाशरूपिणी कान्ता दृश्यश्रीः स्पन्दधर्मिणी । देव्यास्तस्या हि याः काल्या नानाभिनयनर्तनाः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

उनकी असूर्तता और स्वच्छता भी आकाश के ही सद्रथ समञ्मनी चाहिए, यह कहते हैं । शिवजी और शिवा दोनों आकाश के सदृश हैं और उनका स्वरूप अमूर्त है, आकाश के बड़े भाईयों के समान वे दोनों ही अत्यन्त स्वच्छ हैं (जव अमूर्त है, तब हाथ, पैर आदि तथा हलादिमाला का धारण कैसे हो सकता ह 2 इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।) भद्र, हाथ, पैर, मुँह तथा सिर आदि की बहुलता एवं अल्पता के भेदसे अनेकरूपता विचित्रता तथा मालादि का धारण है, उसे आप सुनिये । भद्र, एकमात्र स्पन्दनरूपवाली क्रियात्मिका वह भगवती यद्यपि अनादि-अनन्तरूपा चितिशक्ति है, तथापि अपनी इच्छा से अपने समस्त वैदिक क्रियारूप बनकर उसने "दद्यात्‌, स्नायात्‌, जुहुयात्‌" (दो, नहाओ और होमो) इत्यादि वेदविहित दानादि उत्तम शरीर धारण किया है, वास्तव में वह देवी स्पन्दनधर्मयुक्त कमनीय दृश्य श्री आकाशरूपिणी ही है, इसलिए उस काली भगवती के जो नानाविध अभिनयो से पूर्ण नृत्य हैं वे सब ब्रह्मा के कर्मफलरूप सब प्राणियों के जन्म, स्थिति आदि के प्रकार हैं, यह जानना चाहिए