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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

नभो हि मांसमेताभ्यां दृष्टिदृष्टं विलोक्यते । अस्ति नभो नभस्येव तौ नभोनभसि स्थितौ ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

शिव ओर भगवती शिवा दोनों तो वेतनरूप हैं; इसलिए वे जड़ आकाश रूप कैसे हो सकते हैं? इस आशंका पर कहते हैं । चूँकि चिद्रूप शिव और शिवाने मांसमय अपने शरीर के सदृश श्यामवर्णं आकाश को सृष्टिसंकल्पदृष्टि से कल्पा है, इसलिए श्याम-सा एवं जड़-सा दिखाई देता है । जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आकाशरूप वे भी आकाश में (अपने स्वरूप में) निराधार ही स्थित हैं