Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अनन्तरं मुने ब्रूहि काली किमिव नृत्यति ।
किं शूर्पफलकुद्दालमुसलादिस्रजाऽऽवृता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामभद्र ने कहा : हे मुने, आपने जो यह वर्णन किया कि भगवती काली नृत्य करती थी, अब
आप उसका असली स्वरूप बतलाइये ओर वह जो सूप, हलकी फाल, कुदाल, मूसल आदि की माला
पहिने थी, उस माला के सूप आदिका क्या स्वरूप है, कृपया मुझसे यह भी कहिये । इस श्लोक में
"कालः किमिव नृत्यति" पाठान्तर भी है, इस पाठ में भी कालात्मक काली के स्वरूप का ही प्रश्न
समझना चाहिए, क्योंकि पूर्वोत्तर ग्रन्थ में नृत्य एवं सूप आदि की माला का ही वर्णन है
सर्ग सन्दर्भ
तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवों सर्ग शिव ओर शक्ति के स्वरूप का विभागपूर्वक वर्णन तथा सूप आदि की माला के स्वरूप का भी सत्यासत्यविचारपूर्वक वर्णन।