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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 82

इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त बयासीवों सर्ग अज्ञान रहने पर कलासहित तथा भलीभाँति ज्ञात हो जाने पर कलारहित चिद्रूप परमात्मा के तत्व का शोधनकर वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1पूर्व सर्ग में बड़े विस्तार के साथ समस्त प्रप का वर्णन किया ग्या हैं तथा प्रलीन हुए उत प्…
  2. Verse 2तीनों जगत्‌ का नष्ट क्या हुआ, फिर काली की देह में स्थित क्या रहा और निर्वाण को प्राप्त हु…
  3. Verse 3उसने नृत्य ही किया है । सच कहना तो यह है कि भगवती काली ओर भगवान्‌ रुद्र-ये दोनों ही, जैसा…
  4. Verse 4किन्तु जो कारणों का कारण है वही अनादि चिन्मात्र, आकाशस्वरूप, अनन्त, शान्त, प्रकाशस्वरूप,…
  5. Verse 5निरतिशयानन्देकरस वह ब्रह्म ही नीलकण्ठ, त्रिनेत्र आदि रूप धरकर प्रलयकाल में भैरवाकार उपासक…
  6. Verse 6चेतन ब्रह्म मे ही जगद्‌ का उपहार श्रुतिरयो में प्रस्तिद्ध है / लोक मे निकार चेतन कहीं नही…
  7. Verse 7जैसे कटक, केयूर आदि के आकार में परिणत हुए बिना छुवर्ण नहीं रह सकता यानी किी- न-किसी अलंका…
  8. Verse 8स्रविषयता स्वभाव होने से भी अज्ञात चिति के आकार का किसी तरह परित्याग नहीं।किया जा सकता; इ…
  9. Verse 9कहिये न, माधुर्य के बिना इक्षुरस कैसे रह सकता है, क्योकि माधुर्य से रहित जो इक्षु का रस ह…
  10. Verse 10नष्ट हुए पदार्थों का भी स्मृति में भान होता है, इसलिए वितिद्रष्टि से किकी भी पदार्थ का नि…
  11. Verse 11ब्रह्म से अभिन्न जो यह जगत्‌ है, उसके एकमात्र ब्रह्मसत्ता चे अतिरिक्त रुपकी प्रभिदि न होन…
  12. Verses 12–13(तव किये, जगत्‌ का स्वरूप क्या हैं 2 यदि यह कोई प्रश्न करे, तो उसके इस प्रश्न का उत्तर यह…
  13. Verses 14–18हे श्रीरामचन्द्रजी, जन्म, मरण, माया, मोह, जडता, अवस्तुता, वस्तुता, विवेक, बन्ध, मोक्ष, शु…
  14. Verses 19–20इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि यह सब कुछ निर्मल चिदाकाश ही स्थित है इससे भिन्न कुछ नहीं है…
  15. Verse 21मैंने अभी आपसे वर्णन किया हे वह “शिव एको ध्येयः शिवशंकरः सर्वमन्यत्‌ परित्यज्य इत्यादि श्…
  16. Verse 22यही परमात्मा वायु, मेघ और सागर है तथा अतीतादि काल भी यही है । तीनों काल में जिस वस्तु की…
  17. Verse 23अन्यथा ग्रहण करनेवाली अविद्या द्वारा इस तरह की संज्ञाओं से ब्रह्मा, विष्णु आदि ऐसे हो जात…
  18. Verse 24चिदाकाशरूप ब्रह्म ही अज्ञदुष्टि से अबोधस्वरूप होकर जीव ओर जगत्‌ के रूपसे स्थित है तथा तत्…
  19. Verse 25यह जीव जब तक परब्रह्मात्मक अपने स्वभाव को नहीं जानता तब तक यह अज्ञानस्वात्मस्वरूप संसाररू…
  20. Verse 26यही कहते है-अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तो वह जीव वैसे शान्ति को प्राप्त हो जाता है ज…